Friday, September 11, 2009

मुकेश के दो प्रेरक गाने

https://youtu.be/jNp63arV5Pk

ऐ दिले आवारा चल ,फिर कहीं दोबारा चल ।
यार ने दीदार का वादा किया है ।
, डॉ. विद्या नामक फिल्म से ।
 https://youtu.be/2Zb0XlERT7M










’गर्दिश में हों तारे , ना घबड़ाना प्यारे’ , फिल्म रेशमी रुमाल

दोनों ही गीत विविध भारती पर सुबह - सुबह सुने । ऐसे गीतों को नियमित रूप से सुनने के लिए जरूरी है कि ट्रांजिस्टर नामक पुरानी टेक्नॉलॉजी का यन्त्र ( नए चले एफ़ एम बैण्ड सहित ) रखा जाए ।
एक सवाल विविध भारती के मित्रों से जरूर है । हमारे शहर बनारस में एफ़ एम पर विविध भारती है लेकिन उसमें निजी चैनलों की तरह स्टीरियो-असर क्यों नहीं सुनाई पड़ता ? अपनी तमाम मजबूतियों के अलावा इस पर ध्यान देना होगा ।

Sunday, August 23, 2009

गाइये गणपति जगवन्दन / तुलसीदास /आश्विनी भिडे देशपाण्डे

गाइए गणपति जग वन्दन ,
शंकर सुवन , भवानीनन्दन ।
सिद्धि सदन,गजवदन ,विनायक ,
कृपा-सिन्धु , सुन्दर सब लायक ।
मोदक प्रिय,मुद मंगलअदाता ,
विद्या-वारिधी ,बुद्धि विधाता ।
मांगत तुलसीदास कर जोरे,
बसे राम-सिय मानस मोरे ॥

शास्त्रीय गायन की वरिष्ट कलाकार अश्विनी भिडे देशपाण्डे के स्वर में , राग विहाग में यह प्रस्तुति ।




[कृपया पूरी बफ़रिंग के बाद सुनें - बिना बाधा। सबसे पहले बड़े तिकोने पर खटका मारें । बफ़रिंग के लिए ,कर्सर को प्लेयर के निचले हिस्से में स्थित नियंत्रण पर ले जाकर , शुरु होते ही रोक दीजिए तथा खड़ी डण्डियां भर जाने तक प्रतीक्षा करें(या अन्य काम करें),तब सुनें । ]

Saturday, August 22, 2009

मैं दादा बन गया !


परसों भीमसेन जोशी का गीत लगाते वक्त बमबम उर्फ़ सुकरात और पूजा की याद तो खूब आ रही थी लेकिन मुझे अन्दाज था कि नवागन्तुक के आने की अपेक्षित तिथि में विलम्ब है । बालक भीमसेन जोशी के गीत और आने वाली पीढ़ी की तरह फ़ास्ट निकला, आज पैदा हो गया ।
४ अगस्त , १९७५ के दिन बनारस के सरकारी जिला महिला अस्पताल में बमबम की पैदाईश की याद घूम गयी । आपात काल लगे मात्र १०-११ दिन हुए थे । बमबम के पिता , मेरे बड़े भाई नचिकेता भूमिगत थे । मेरी माँ को चिन्ता थी कि कि भाई ऐन वक्त पर पहुँचेगा भी या नहीं । लगता था कि बमबम ने मेरी भाभी रत्ना को खूब झेलाया होगा । मेरी दीदी उसी अस्पताल में चिकित्साधिकारी थी ।
बमबम बनारस में चार साल की उमर तक था । लंगोट बदलने आदि की मुझे पहली तालीम देते हुए।
बमबम और ’बेटा रामदास’ मेरे दिए हुए नाम हैं । आज फोन पर उससे पूछा, ’टनटन ?’ तो उसे लगा कि ककवा फिर नाम रखने लगा ।
अपने गुरुजी श्री छन्नूलाल मिश्र का गाया यह सोहर प्रस्तुत करने का आज उपयुक्त दिन । हमें जो सोहर उन्होंने सिखाया था , उससे बेहतर है ,यह:
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Thursday, August 20, 2009

ठुमक ठुमक पग ,कुमक कुंज मद,चपल चरण हरि आए/भीमसेन जोशी/जयदेव/अनिल चटर्जी/अनकही

अनकही (१९८५) फिल्म में लिया गया भीमसेन जोशी का गाया तुलसी का भजन "रघुवर तुमको मेरी लाज” इस चिट्ठे पर प्रकाशित किया था । वह भजन भी फिल्म में प्रसिद्ध बाँग्ला अभिनेता अनिल चटर्जी ( २५ अक्टूबर १९२९ - १७ मार्च १९९६ )गा रहे हैं । मेरे प्रिय मित्र - श्रोता विष्णु बैरागी ने तब कहा था , ’ पापाजी (जयदेवजी)ही ऐसे अनूठे और साहसी प्रयोग कर सकते थे। वे गीतों की धुनें नहीं रचते थे, आत्‍मा को शरीर प्रदान करते थे।’ फिल्म में इस पूरे गीत का फिल्मांकन - विष्णु भाई के कथन को पूरी तरह चरितार्थ करता हुआ ! दीप्ति नवल का प्रसव, श्रीराम लागू की पायचारी , दीना पाठक की चिन्ता , अनिल चटर्जी की निश्चन्तता , अमोल पालेकर की गति !
मानोषी ने तब बताया था कि "फिल्म का हर गाना उम्दा है " । ढ़ूँढ़ लिए थे गीत लेकिन सुनाने का जुगाड़ अब हो पाया।
कोई गीतकार का नाम बता दे !



[ प्लेयर पर कर्सर को निचले भाग में ले जायेंगे तो नियन्त्रण के औजार दिखाई देंगे। फिर से सुनने के लिए गीत समाप्त होने पर कर्सर निचले भाग में ले जाना होता है और खटका मारना होता है । फिर से सुनने , एम्बेड कोड और डाउनलोड के प्रावधान परदे पर प्रकट हो जाते हैं । डिवशेयर की खूबी है कि दूसरी बार (बफ़रिंग के पश्चात) सुनने पर बिलकुल रुकावट नहीं होती । ]

Thursday, August 6, 2009

माउथ ऑर्गन के उस्ताद मदन कुमार अहमदाबाद में

वडोदरा और अहमदाबाद में गैर पेशेवर स्तर पर माउथ ऑर्गन बजाने वालों के क्लब हैं । माउथ ऑर्गन को हार्मोनिका भी कहा जाता है । मेरे बड़े भाई नचिकेता ’हार्मोनिका क्लब ऑफ़ गुजरात’ के सक्रिय सदस्यों में एक हैं ।
करीब आठ साल की उम्र से वह माउथ ऑर्गन का दीवाना हुआ था - यानी मेरी पैदाइश के आसपास कभी । मेरी माँ की नानी स्नेहलता सेन शान्तिनिकेतन की स्थापना के समय से वहाँ के एक छात्रावास की अधीक्षक थीं और मेरी नानी और उनके दो भाई शान्तिनिकेतन के शुरुआती विद्यार्थियों में थे । नानी वीणा बजातीं और मेरी माँ के छोटे मामू जान (हमारे दादुल) बाँसुरी । माँ के ममेरे भाइयों में एक माउथ ऑर्गन बजाते थे और उन्हें देख कर ही भाई साहब पर इसकी धुन सवार हो गयी थी ।
पिछले रविवार को अहमदाबाद के हार्मोनिका क्लब के सदस्यों का उत्साह देखने लायक रहा होगा । भारत में माउथ ऑर्गन बजाने वालों में श्रेष्ठतम मदन कुमार अहमदाबाद आये हुए थे और क्लब वालों के बीच आना स्वीकार किया था । मदन कुमार ने इनके बीच अपनी राम कहानी सुनाई ,धुनें सुनाईं और कुछ सबक भी दिए । उन्हें शैशव से ही पिता का स्नेह नहीं मिला और अपने संघर्ष के बूते वे देश के सर्वश्रेष्ठ माउथ ऑर्गन वादक बने । आज कल पुणे में वे बच्चों को बजाना सिखाते हैं ।
उनकी अपनी जुबानी उनकी राम कहानी हार्मोनिका क्लब ऑफ़ गुजरात के ब्लॉग पर आती रहेगी । यहाँ क्लब के विशेष सौजन्य से उनका बजाया ,उनके सर्वाधिक पसन्दीदा गीत - ’याद किया दिल ने कहाँ हो तुम ’ की धुन ।



सुबह सिलोन पर मदन कुमार को सुनने के अलावा शाम को विविध भारती पर ’साज और आवाज’ की भी आपको याद होगी । इसलिए उन दिनों की याद में मूल गीत भी सुनिए :



[ प्लेयर पर कर्सर को निचले भाग में ले जायेंगे तो नियन्त्रण के औजार दिखाई देंगे। फिर से सुनने के लिए गीत समाप्त होने पर कर्सर निचले भाग में ले जाना होता है और खटका मारना होता है । फिर से सुनने , एम्बेड कोड और डाउनलोड के प्रावधान परदे पर प्रकट हो जाते हैं । डिवशेयर की खूबी है कि दूसरी बार सुनने पर बिलकुल रुकावट नहीं होती । ]

Wednesday, August 5, 2009

अज़दक के लिए : मुझे प्यार तुमसे नहीं है / घरौंदा/ रूना लैला/जयदेव/गुलजार

पिछले साल जब रूना लैला के गीत यहाँ लगाये थे , अज़दक ने सराहा था । सभी रसों को ग्रहण करने वाला - इसके लिए हमारे हिन्दी के गुरुजी ने एक नाम बताया था - आश्रय । तो अपने इस आशिक-मिजाज आश्रय मित्र के लिए यह गीत-



तुम्हे हो न हो मुझको तो इतना यक़ीं है
मुझे प्यार तुमसे नहीं है , नहीं है ।
मुझे प्यार तुमसे नहीं है ,नहीं है
मगर मैंने ये राज़ अब तक न जाना
के क्यों प्यारी लगती हैं बातें तुम्हारी,
मैं क्यों तुमसे मिलने का ढूँढू बहाना
कभी मैंने चाहा तुम्हें छू के देखूँ,
कभी मैंने चाहा तुम्हें पास लाना
मगर फ़िर भी इस बात का तो यकीं है...

फ़िर भी जो तुम दूर रहते हो मुझसे,
तो रहते हैं दिल पे उदासी के साये ।
कोई ख़्वाब ऊँचे मकानों से झाँके ,
कोई ख़्वाब बैठा रहे सर झुकाये
कभी दिल की राहों में फैले अँधेरा
कभी दूर तक रोशनी मुसकुराये ।
मग़र फ़िर भी इस बात का तो यक़ीं है......

- गुलज़ार नहीं नक्श लायलपुरी (विनयजी के सुधारने पर)





[ प्लेयर पर कर्सर को निचले भाग में ले जायेंगे तो नियन्त्रण के औजार दिखाई देंगे। फिर से सुनने के लिए गीत समाप्त होने पर कर्सर निचले भाग में ले जाना होता है और खटका मारना होता है । फिर से सुनने , एम्बेड कोड और डाउनलोड के प्रावधान परदे पर प्रकट हो जाते हैं । डिवशेयर की खूबी है कि दूसरी बार सुनने पर बिलकुल रुकावट नहीं होती । ]

Wednesday, July 29, 2009

लालित्यपूर्ण लीला नायडू की स्मृति में अनुराधा


लालित्यपूर्ण फिल्म नायिका लीला नायडू का कल लम्बी बीमारी के बाद देहान्त हो गया । वे ६९ वर्ष की थी । उनके पिता रामैय्या नायडू परमाणु भौतिकविद थे , माँ आयरलैण्ड/फ्रांसीसी मूल की थीं । वे १९५४ की फेमिना मिस इंडिया थीं । महारानी गायत्री देवी के साथ लीला नायडू को भी वोग पत्रिका ने दुनिया की दस सुन्दर महिलाओं की अपनी सूची में रखा था ।
उन्होंने १९६० में बनी हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म अनुराधा से अभिनय की शुरुआत की । इस फिल्म का संगीत मशहूर सितारवादक पण्डित रवि शंकर का था । इस फिल्म में उनके नायक बलराज साहनी थे । अनुराधा चली नहीं लेकिन लीला नायडू के अभिनय की अच्छी चर्चा हुई और फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। लीला नायडू की स्मृति में लता मंगेशकर के गाये अनुराधा के चार अमर गीत आज प्रस्तुत किए जाए रहे हैं ।

१. हाय रे वो दिन क्यूँ न आए

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२. कैसे दिन बीते , कैसे बीतीं रतियाँ

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३. साँवरे - साँवरे



४. जाने कैसे सपनों में खो गईं

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Friday, July 24, 2009

मस्ती में झूले और सभी गम भूलें : सचिन बर्मन/लता/साहिर/हाऊस नं ४४

कहते हैं कि लता मंगेशकर द्वारा इस गाने की अदायगी से गदगद होकर सचिन देव बर्मन ने अपना एक बीड़ा पान उन्हें पेश कर दिया था । पान के अपने भंडार में से एक पान घटाना वे तब ही करते जब दिल से मामला जमा हो ।
१९५५ में बनी हाउस नम्बर ४४ । साहिर लुधायनवी की सुन्दर - सहज शब्द रचना । कल्पना कार्तिक पर फिल्माया गया ।
फैली हुई हैं सपनों की बाहें , आ जा चल दें कहीं दूर
वहीं मेरी मंजिल , वहीं तेरी राहें , आ जा चल दें कहीं दूर ।
ऊँची घटा के साये तले छिप जाँए,
धुँधली फ़िज़ा में ,कुछ खोयें ,कुछ पायें ।
साँसों की लय पर , कोई ऐसी धुन गायें,
दे दे जो दिल को दिल की पनाहें ॥ आ जा चल दें...

झूला ढलकता ,घिर घिर हम झूमें,
अम्बर तो क्या है , तारों के भी लब चूमें ।
मस्ती में झूलें और सभी गम भूलें ,
पीछे न देखें मुड़ के निगाहें ॥ आ जा चल दें
साहिर लुधियानवी

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Monday, July 20, 2009

उस्ताद अमीर खान / पूरिया धनश्री / बैजू बावरा / तोरी जय जय करतार

बैजू बावरा फिल्म में पक्का गायन तानसेन के लिए उस्ताद अमीर खान और बैजू बावरा के लिए पण्डित डी. वी. पलुस्कर ने किया था । विविध भारती पर उस्ताद अमीर खान के गाई इस बन्दिश को नहीं सुना । संगीत निर्देशक नौशाद हैं । यहाँ रस लीजिए :
तोरी जय जय करतार (२)
मोरी भर दे आज झोलिया
तू रहीम दाता तू पाक किरतिकार
तोरी जय जय करतार

तानसेन को तू रब , ज्ञान ध्यान दीजो सब
तानसेन को तू रब ( आलाप )

राग रंग सागर है कर दे नैय्या पार

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Saturday, July 18, 2009

आज सिर्फ़ मन्दीजन्य मरम्मत

कल ही प्रिय मित्र प्रियंकर ने बताया कि उनका प्रिय एक गीत लाइफ़लॉगर खा गया ! गत मकर संक्रांति के दिन इस ब्लॉग पर एक पोस्ट इस विषय पर लिखी थी । तब इस बात का अन्दाज ही नहीं था कि लाईफ़लॉगर जैसी सेवा न केवल नये गीतों को चढ़ाने के लिए मृत है अपितु गैर-मंदी दौर में इस पर चढ़ाये गीत भी साईबर व्योम में डूब गये हैं । फलस्वरूप अच्छी भली पोस्ट गीत/कविता विहीन हो गयी हैं । उन पर भूले भटके जो भी पहुँचता होगा वह अब सिर्फ़ पाठक होगा श्रोता नहीं ! यह उसके साथ घोर अन्याय है।
अत: उन पोस्टों में पड़ी लाईफ़लॉगर की लाइफविहीन एम्बेडिंग कोड को हटा कर वैकल्पिक व्यवस्था कर दी गई है । इस मरम्मत को तरजीह दें,गुजारिश है ।

दरियाव की लहर : कबीर का गीत


हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय का एक हिन्दी गीत

शाम सहमी न हो , रात हो न डरी , भोर की आंख फिर डबडबायी न हो


बाकी मरम्मत फिर कभी ।

Friday, July 17, 2009

मन मोर हुआ मतवाला / सचिनदेव बर्मन / नरेन्द्र शर्मा / सुरैय्या /

पूर्वी उत्तर प्रदेश में कम बारिश होने के बावजूद दो बार मोर को मतवाले होते देख पाया । पहली बार तो एक बच्चा (मानव)पहले दिखा । कितना अचंभित,अभिभूत ! पहली बार मोर को नाचते हुए देखा होगा।
अफ़सर फिल्म (१९५०) के इस सुरीले गीत में नरेन्द्र शर्मा, सचिनदेव बर्मन और सुरैय्या सबका अपूर्व योगदान है :



सैंकड़ों पुराने गीतों के दो डीवीडी सागर नाहर ने मुझे भेट दिए । उनमें से एक में है , यह ।

Thursday, July 16, 2009

तोसे नैना लागे रे, पिया साँवरे



कल ही एक मित्र के ईस्नाइप के फोल्डर में सुना । मित्र समीरलाल को समर्पित ।

मोरा सैंया मो से बोले ना !

यह गीत जरूर सुनें । इस गीत के बारे में कोई सूचना दे सकें तो और खुशी होगी ।

Monday, July 13, 2009

बादल देख डरी / मीरा / वाणी जयराम / पण्डित रविशंकर

बादल देख डरी हो, स्याम, मैं बादल देख डरी
श्याम मैं बादल देख डरी
काली-पीली घटा ऊमड़ी बरस्यो एक घरी
जित जाऊं तित पाणी पाणी हुई सब भोम हरी
जाके पिया परदेस बसत है भीजे बाहर खरी
मीरा के प्रभु गिरधर नागर कीजो प्रीत खरी
श्याम मैं बादल देख डरी

मीराबाई के इस पद को ज्युथिका राय से लगायत कई गायिकाओं और गायकों ने भी गाया है । मशहूर ब्लॉगर ने ज्युथिका राय का गाया ’ गीतों की महफ़िल ’ में पहले पेश किया था। गुलजार की बनाई ’ मीरा’ फिल्म में पण्डित रविशंकर का संगीत है और इस पद को वाणी जयराम ने गाया है । वाणी जयराम का गाया मेरी पत्नी डॉ. स्वाति गुनगुनाती हैं और ’जाके पिया परदेस बसत है भीजे बाहर खरी ’ की तर्ज पर हमें भीजता छोड़ लम्बे अध्ययन अवकाश पर जा रही हैं ।

Saturday, July 11, 2009

जा रे बदरा बैरी जा / फिल्म - बहाना /लता/ मदन मोहन

पिछले साल इस ब्लॉग पर ऋतु अनुकूल गीतों की एक पोस्ट प्रस्तुत की थी । इस साल मानसून विलम्बित है फिर भी छिटपुट बदरा छाते ही कुछ मधुर धुनें बहकाने लगती हैं । आज १९६० में बनी फिल्म बहाना में लता मंगेशकर की आवाज में मदन मोहन द्वारा संगीत में ढाला गया यह गीत पेश कर रहा हूँ । कहते हैं , यह राग यमन कल्याण पर आधारित है ।

Thursday, July 2, 2009

तीन सदाबहार कव्वालियां

तीन सदाबहार फिल्मी कव्वालियाँ प्रस्तुत हैं । लोग- बाग पसन्द करेंगे तो और पेश करने का साहस करूँगा । इन कव्वालियों का रुहानी अर्थ पहले नहीं दिखता था । यह मत सोचिएगा कि बुढ़ौती का परिणाम है- दिखने लगना । लोकनायक जयप्रकाश बताते थे कि किशोर और तरुणों के लिए भी आध्यात्मिकता की तमाम मिसालें दे कर ।

ये है इश्क - इश्क

न तो कारवाँ की तलाश है

कहीं दाग न लग जाए

Wednesday, July 1, 2009

रफ़ी और अनेक



विविध भारती से कभी एक कार्यक्रम प्रसारित होता था - ’एक और अनेक’ । आज उसी कार्यक्रम की याद में मोहम्मद रफ़ी के साथ विभिन्न गायिकाओं के दोगाने हैं ।

Sunday, June 28, 2009

येसूदास के आठ मधुर गीत


येसुदास के हिन्दी फिल्मी गीतों का दौर । बहुत आनन्ददायक दौर । क्या किसी क्षेत्रवादी साजिश के कारण उन्होंने हिन्दी फिल्मों गीतों में गाना बन्द कर दिया था ? अज़दक भाई शायद बता दें । या युनुस बतायें ।

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Saturday, April 25, 2009

ये पाँच सालों का देने हिसाब आये हैं

कमलेश्वर और गुजराल की फिल्म आँधी आपातकाल के दौरान आई थी । इसे अलिखित तौर पर रोक दिया गया था । इस गीत में सुचित्रा सेन की चाल से आपको इन्दिरा गाँधी की चाल नहीं याद आती ?