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Friday, August 1, 2008

गाना माने प्यार करना, हाँ कहना , उड़ना और ऊँचे उड़ना


पिछले हिस्से से आगे : सभा जोन बाएज़ द्वारा संचालित अहिंसा प्रशिक्षण केन्द्र में थे । सेनफ्रान्सिस्को तथा आसपास के कई जवान आये थे । दो - तीन घण्टे तक मुझसे प्रश्नोत्तरी चलती रही ।
सभा के बाद मुझसे कहा गया कि जोन तो अपने घर चली गयी है , लेकिन शाम को अपने यहाँ आने का निमत्रण दे गई है ।
एक पहाड़ी पर जोन और डेविड का घर था । डेवि्ड तो अभी जेल काट रहा था । जोन उसके जेल जाने के बारे में कहानियाँ कह और गाने गाकर लोगों को युद्ध का विरोध सिखाती थी । जोन के पेट में बच्चा था , जिसका वह बहुत गर्व अनुभव करती थी । किसी बालक की-सी सरलता से वह अपना पेट मित्रों को दिखाती रहती थी ।
बात तो कोई खास करने की थी ही नहीं । लेकिन उन दिनों जोन के साथ जेकी नामक एक जवान रहता था । उसने मुझे प्रश्न पूछना शुरु किया । योग के बारे में , ध्यान के बारे में , भारत के बारे में कई प्रश्न पूछ डाले । मेरे जवाबों को जोन ध्यान से सुनती रही ।
जेकी जब कहीं बाहर गया तब जोन ने कहा : " यह लड़का तुम्हें फिजूल के प्रश्न पूछ कर तंग करता है , नहीं ?" मैंने कहा : उसके प्रश्न उसके लिए तो वास्तविक मालूम हो रहे हैं । हाँ , मेरे जवाबों से उसे संतोष होता होगा या नहीं , मैं नहीं जानता । " उसने मुझे पूछा : "तुम इस समय का क्या उपयोग करना चाहोगे ? " मैंने कहा : "संगीत।"
अपना गिटार थमाते हुए जोन ने कहा : "तुम गाओगे?"
मैंने कहा : "क्या संगीत गाया ही जाता है , सुना नहीं जाता ?"
वह हँस पड़ी और फिर गिटार के तार ठीक करने लग गयी । यह गिटार एक बार कोई चुरा ले गया था । लेकिन फिर शायद यह मालूम होने पर कि यह जोन बाएज़ का है , वह लौटा दिया गया था ।
गाने के लिए जोन को आग्रह नहीं करना पड़ता । वह गाती रही । मैं सुनता रहा । मंत्र-मुग्ध-सा सुनता रहा । अपने संगीत से जोन लाखों लोगों को डुला देती है । मैं अपने भाग्य को सराह रहा था , जो इतने निकट बैठ कर इस संगीत का सुधा-पान कर रहा था ।
एक पूरी शाम इस अमरीकन मीराबाई के भजन सुनने में बितायी। जाने से पहले उसने पूछा : "तुम क्या लोगे? कुछ खाओगे,कुछ पीओगे ?" इसे मैं क्या बताता ? क्या पेट भरना अब भी बाकी था? मैंने कहा:" खाना - पीना तो कुछ नहीं, लेकिन अगर माँग सकता हूँ तो तुम्हारा एक रेकार्ड दे दो ।" तुरंत उसने एक बदले दो रेकार्ड दे दिए ।उस पर अपने हस्ताक्षर भी कर दिए । एक रेकार्ड के कवर पर जोन बायेज़ का खुद का आँका हुआ चित्र है । जोन का पूरा व्यक्तित्व ही कलाकार का है। वह कलापूर्ण लिखती है , कलापूर्ण कविता बनाती है । और कलाकारों से इसमें कोई विशेषता हो तो वह यह है कि इसकी कला का एक उद्देश्य है मानव की मुक्ति । इसी कारण से वह शांतिवादी बनी है । इसी कारण वह संगीत के जलसे छोड़कर जेलखाने के चक्कर काटना पसंद करती है ।
उसका जीवन - चरित्र 'डे-ब्रेक' एक अनुपम कलाकृति है । देखिये शुरु के ही एक अध्याय में बालवाड़ी का यह दृश्य :"माँ कहती है कि बालवाड़ी से जब मैं पहले दिन लौटी , तब आते ही मैंने कहा कि मैं किसीके प्रेम में हूँ । मुझे एक जापानी लड़का याद है , जिसने मेरा ख्याल रखा और जिसने किसीके धक्के से मुझे बचाया था। जब लोगों ने मुझे खाने के लिए सेम दिए , तब मैंने उससे कहा कि इसको खाने से तो मुझे कै ही हो जाएगी । तब उसने मेरे लिए सेम को टेबुल के नीचे छिपा दिया था ।
" एक सेंट बर्नार्ड कुत्ते ने एक दिन मुझसे खेलना चाहा और उसने मुझे एक टीले से नीचे ढकेल दिया। मैं इतनी घबड़ा गयी कि मेरा पैण्ट ही गीला हो गया ।"
" एक लड़का था , जो मेरे साथ बैठकर दूध पीता था । वह फूल बहुत बीनता था। मैं हमेशा उसके सिर पर हाथ फेरना चाहती थी । बच्चे उसे लड़की-लड़की कहकर पुकारते थे ।"
या उस किताब का देखिये यह एक छोटा-सा अध्याय :
" गाना माने प्यार करना , हाँ कहना , उड़ना और ऊँचे उड़ना , सुननेवाले लोगों के हृदय में किनारे पर पहुँच जाना , उनसे यह कहना कि जीवन जीने के लिए है : प्यार है , कोई केवल वचन नहीं है , सुन्दरता अस्तित्व रखती है और उसकी खोज करनी चाहिए और पाना चाहिए। मृत्यु एक ऐसे ऐश की चीज है , जिसे जीवन में उतारने की अपेक्षा जिसके गाने गाना ही उचित है । गाना माने ईश्वर की स्तुति करना और डेफ़ोडिल पुष्पों की स्तुति करना है । और ईश्वर की स्तुति का अर्थ है उसका आभार मानना मेरे मर्यादित स्वरों के हर सुर से , मेरे कंठ के हर रंग से , मेरे श्रोताओं के हर दृष्टिपात से। हे ईश्वर , मैं तेरी आभारी हूँ: मुझे जन्म देने के लिए , पवन में झूमते हुए इन डेफ़ोडिल पुष्पों को देखने के वास्ते मुझे नयन देने के लिए । मेरे सब भाइयों और बहनों का क्रंदन सुनने के वास्ते मुझे श्रवण देने के लिए , भागकर आने के वास्ते मुझे चरण देने के लिए , गीले गालों को सुखाने के वास्ते मुझे हाथ देने के लिए , हँसने के लिए और गाने के लिए मुझे कंठ देने के लिए , इसलिए कि मैं तुम्हारे लिए गा सकूँ और डेफोडिल के लिए भी गा सकूँ - क्योंकि पुष्प भी तू ही है ।"

संगीत की यह परिभाषा जोन बायेज़ के जीवन में प्रकट होती है । इसीलिए उसकी तुलना प्राचीन मीराबाई या अर्वाचीन शुभलक्ष्मी से हो सकती है ।
जाते समय मैंने उससे पूछा : :बच्चे के नाम के बारे में विचार किया है?"
उन लोगों ने दो वाद्यों के नाम सोच रखे थे । लड़का हो तो एक नाम , लड़की हो तो दूसरा।
उसने मुझे पूछा: "क्यों तुम्हारा कोई सुझाव है?"
मैंने कहा : " भारतीय नाम रखना हो तो 'शांति' रखो । लड़के के लिए भी चलेगा , लड़की के लिए भी । " .
 

Thursday, July 31, 2008

अशोक पाण्डे को समर्पित जोन बायेज़ पर पोस्ट

[ प्रिय चिट्ठेकार अशोक पाण्डे को जोन बायेज़ पर केन्द्रित यह संस्मरणात्मक पोस्ट समर्पित करते हुए मुझे खुशी हो रही है। नारायण देसाई १९६९ में विश्व भ्रमण पर निकले थे तथा उनका यात्रा विवरण 'यत्र विश्वं भवत्येकनीडम् ' नाम से छपा था । पुस्तक अप्राप्य है । लेखक के पुस्तकालय से जुगाड़ हुआ है। ]
.... शाम को कार्मेल में जोन बायेज़ के माता - पिता के साथ ठहरा । उनके पिता तो इन्फ़्लुएन्जा के कारण बिछौने में थे। माता ने आते ही पूछा : "क्यों खाना-पीना किया या बाकी है ? मैं जानती ही थी कि तुम वेजिटेरियन होगे , इसलिए तुम्हारे लिए वेजिटेबल सूप तैयार रखा है ।"
कौन कहता है मेरी माँ नहीं रही ? वह तो मुझे दर्शन देती है उत्तरी अमरीका के पश्चिमी कोने के इस छोटे से कार्मेल गांव में भी ।
जोन बायेज़ के पिता बड़े वैज्ञानिक हैं । उनकी बीमारी के कारण उनसे अधिक बातें करने का मौका नहीं मिला । सारा घर ग्रामोफोन रेकार्ड तथा किताबों से भरा हुआ । सिर्फ मिस्टर बायेज़ का दफ़्तर बहुत व्यवस्थित था। श्री बायेज़ से एक किस्सा सुना। युनेस्को के काम के सिलसिले में वे रूस गये हुए थे किसी प्रतिनिधि-मंडल के साथ । उनके नाम में बायेज़ देखकर लोग पूछने लगे कि क्या आप जोन बायेज़ के कोई रिश्तेदार तो नहीं हैं ? पुत्री के नाम से अपना परिचय होते हुए देखकर इस विख्यात वैज्ञानिक ने बड़ा सन्तोष अनुभव किया होगा।
पुत्री से भेंट तो दूसरे दिन होने वाली थी । इस दिन तो उसकी माँ से ही परिचय करना था । माँ ने और कुछ नहीं किया होता और सिर्फ जोन को जन्म दिया होता तो भी वह धन्य हो जाती। लेकिन इस माँ ने तो जोन को संस्कार भी दिए थे । अपनी जीवन-कथा 'डे-ब्रेक' में जोन ने इसे बखूबी लिखा है । कैसे बचपन के जोन के भय के संस्कार श्रीमती बायेज़ ने प्रेम और धीरज दे-देकर मिटाये , कैसे एक साल तक छुट्टी पाने पर उस समय में जोन की सारी अभिव्यक्ति को प्रकाश मिला , कैसे उन्होंने जोन के साथ दो बार जेल में जाकर अन्य स्त्रियों का कारावास-भय मिटाया इत्यादि । रात को मुझे उसी खटिये पर सुलाया गया , जहाँ जोन आने पर सोती है । रातभर श्री बायेज़ पास के कमरे में खाँसते रहे । और जब तक जागा मैं इस जोड़े के बारे में सोचता रहा , जिसने अमरीका की सबसे प्रसिद्ध गायिका- या सबसे प्रसिद्ध शान्तिवादी ? - जोन बायेज़ को जन्म दिया था ।
दूसरे दिन जब पालो आल्टो में कई और लोगों के साथ जोन बायेज़ का भी परिचय कराया गया , तब कुछ क्षण तो मैं उसे पहचान ही न पाया । उसके दो कारण थे । एक तो , जोन ने अपने लम्बे बाल कटवा लिये थे । और दूसरा , परिचय करानेवाले ने मिसेज बायेज़ हेरिस कहकर उसका परिचय दिया था। चित्र में देखी हुई जोन लंबे बालवाली थी और मैं तो यह भूल ही गया था कि डेविड हेरिस नामक एक शांतिवादी से उसकी शादी हो चुकी थी।
लेकिन जब सहज ही उसके इर्द-गिर्द प्रशंसकों की भीड़ होने लग गयी , तब मैं अचानक समझ गया कि यही जोन बायेज़ थी ।
आमतौर पर अमरीका में सभा का आरंभ गीतों से नहीं होता । लेकिन मेरी प्रार्थना को उसने बिना किसी आग्रह के स्वीकार कर लिया। क्या अदभुत् कण्ठ है ! जितना मधुर उतना ही बुलंद। जितना दर्द उतना ही कंप । सुर किसी निर्झर की सहजता से बहते थे , किन्तु साथ ही यह भी पता चलता था कि इसके पीछे बरसों की साधना थी ।



[ जारी ]