Thursday 20 December 2007

शाम सहमी न हो , रात हो न डरी , भोर की आंख फिर डबडबायी न हो

इसलिए राह संघर्ष की हम चुनें
जिंदगी आंसुओं से नहायी न हो
शाम सहमी न हो , रात हो न डरी
भोर की आंख फिर डबडबायी न हो ।। इसलिए...

सूर्य पर बादलों का न पहरा रहे
रोशनी रोशनाई में डूबी न हो
यूं न ईमान फुटपाथ पर हो पड़ा
हर समय आत्मा सबकी ऊबी न हो
आसमां पे टंगी हो न खुशहालियां
कैद महलों में सबकी कमाई न हो ॥ इसलिए ...

कोई अपनी खुशी के लिए गैर की
रोटियां छीन ले हम नहीं चाहते
छींटकर थोड़ा चारा कोई उम्र की
हर खुशी बीन ले हम नहीं चाहते
हो किसी के लिए मखमली बिस्तरा
और किसी के लिये एक चटाई न हो ॥ इसलिए ...

अब तमन्नाएं फिर न करें खुदकुशी
ख़्वाब पर ख़ौफ़ की चौकसी न रहे
श्रम के पांवों में हों न पड़ी बेड़ियां
शक्ति की पीठ अब ज्यादती ना सहे
दम न तोड़े कहीं भूख से बचपना
रोटियों के लिए अब लड़ाई न हो ॥ इसलिए ...

--------- xxxxxxxxx --------------


[ कोई पाठक/ श्रोता यदि गीतकार का नाम बताएगा तो मैं यहाँ जोड़ना चाहूँगा । मैं श्रव्य हूँ । ]

10 comments:

  1. इसलिए राह संघर्ष की हम चुनें
    जिंदगी आंसुओं से नहायी न हो
    शाम सहमी न हो , रात हो न डरी
    भोर की आंख फिर डबडबायी न हो ।। इसलिए
    अब तमन्नाएं फिर न करें खुदकुशी
    दम न तोड़े कहीं भूख से बचपना
    रोटियों के लिए अब लड़ाई न हो ॥ इसलिए ...
    ये पंक्तियाँ बहुत पसन्द आईं ।
    ये गीत केवल गाने ही नहीं हैं अपितु हमें अलग व नए और आपके विचारों से भी अवगत कराते हैं ।
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
  2. इसलिए राह संघर्ष की हम चुनें
    जिंदगी आंसुओं से नहायी न हो
    शाम सहमी न हो , रात हो न डरी
    भोर की आंख फिर डबडबायी न हो ।।

    कोई अपनी खुशी के लिए गैर की
    रोटियां छीन ले हम नहीं चाहते
    छींटकर थोड़ा चारा कोई उम्र की
    हर खुशी बीन ले हम नहीं चाहते

    नव वर्ष के लिये इससे अच्छा संकल्प क्या होगा।

    ReplyDelete
  3. वाह!

    बहुत ही खूबसूरत गीत है... गीत के बोल बहुत ही प्रभावित करते है... अपनी परेशानियों/दु:खों से स्वयं छूटकारे पाने का प्रयास करने का संकल्प बहुत अच्छा लगा...गीतकार जो भी, उन्हें नमन!!!

    और आपका बहुत-बहुत आभार!

    ReplyDelete
  4. व्यापक लोक से सरोकार रखनेवाले गीत, नापसन्द का सवाल ही कहां उठता है.

    ReplyDelete
  5. नया वर्ष आपके लिए शुभ और मंगलमय हो।

    ReplyDelete
  6. बहुत खूबसूरत..
    http://kavikulwant.blogspot.com
    कवि कुलवंत सिंह

    ReplyDelete
  7. padha to pehle bhi tha par sun nahin paya tha...behad behtareen prayaas

    ReplyDelete
  8. बहुत सुंदर। मानवीय सरोकारों को इतनी रचनात्मकता के साथ लिखने के लिए पहले तो गीतकार का और फिर ब्लाग के पाठकों को उपलब्ध कराने के लिए आपका धन्यवाद।

    ReplyDelete
  9. कवि वशिष्ठ अनूप का लिखा गीत है.
    -अशोक भर्गव

    ReplyDelete
  10. बड़े भाई अशोक भार्गव ने बताया कि यह कवि वशिष्ट अनूप का लिखा गीत है। सूचना के लिए उनका आभार।

    ReplyDelete

पसन्द - नापसन्द का इज़हार करें , बल मिलेगा ।