Sunday 16 December 2007

दरियाव की लहर : कबीर का गीत

दरियाव की लहर दरियाव है जी

दरिया और लहर में भिन्न न कोयम ।

उठे तो नीर है , बैठे तो नीर है

कहो जी दूसरा किस तरह होयम,

उसी का फेर के नाम लहर धरा,

लहर के कहे क्या नीर गोयम ।

जगत ही के फेर सब, जगत परब्रह्म में,

ज्ञान कर देखो कबीर गोयम ॥

12 comments:

  1. अच्छा लगा भजन, और गाने का प्रयास भी..उम्मीद है आगे और सुनने को मिलेगा।

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  2. शुर तो बहुत सधा हुआ हौ भाया....यह तो एक दम्मै अलग कबीर है...

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  3. badhiya. rajghat ki yaad taaji ho gayi. ratna ne bhi pasand kiya

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  4. soon kar mun khush ho gaya. rajghat school assembly room ki yaad aayee, aur aankh mein aansu aagayi. ucharan itna spastha he, aur gaya bhi bahut sunder hey.

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  5. bahut khoob. aflatoonn ji ki buland awaj mein.
    kabir ki logic irrefutable he

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  6. bahut khoob. aflatoonn ji ki buland awaj mein.
    kabir ki logic irrefutable he

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  7. ऐसा सधा हुआ सुर किसका है?

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  8. सुरो की कड़ी अच्छी बनेगी :)

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  9. कबीर की रचना पढना और साथ में सुनना एक नया अनुभव है। इस सराहनीय काम के लिए आपको बहुत बहुत बधाई।

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  10. बहुत बढ़िया लगा सुनना, नये प्रयास के लिये बहुत बहुत बधाई।

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  11. अफलातून जी हम ये मान कर चल रहे हैं कि ये आपकी आवाज है । अगर हम गलत हैं तो बता दीजिएगा । और हां आगाज की महफिल में हम लगातार शामिल हैं । चाहे कुछ बोल बोल कर मौजूदगी जताएं चाहे एकदम्‍मै से चुप रहकर ।
    शुभकामनाएं

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  12. आगाज़ की सफलता के लिए हार्दिक बधाई ।
    घुघूती बासूती

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पसन्द - नापसन्द का इज़हार करें , बल मिलेगा ।