श्यामबहादुर 'नम्र' हमारे जीजा सदृश हैं । वरिष्ट सामाजिक कार्यकर्ता और कवि । युवा पत्रकार और चिट्ठेकार अमन के पिता। हमने बचपन में श्यामबहादुर भाई से एक छोटी-सी-कविता सीखी थी , रूपनारायण त्रिपाठी द्वारा रचित । इस साल लाल किले की प्राचीर से चाँद पर जाने के अभियान की मनमोहन सिंह जब घोषणा कर रहे थे तब से रह-रह कर इस कविता की याद आती है । हमने जब इसे सीखा था तब अपोलो अभियान शुरु हो चुका था लेकिन चाँद पर मानव-भ्रमण नहीं हुआ था ।
यह तुम्हारी सभ्यता का काफ़िला,
आजमाने चाँद की दूरी चला ।
किन्तु जीवन में न तय हो पा रहा ,
आदमी और आदमी का फाँसला ॥
तुम अतल गहराइयों में नापते ,
फाँसला सुनसान से सुनसान का ।
किन्तु जीवन में न तय हो पा रहा ,
आँसुओं से फाँसला मुस्कान का ।
क्या करें वह चन्द्रमा का देश हम ,
जो अगम लगता हमारे पाँव को ।
क्या करें आकाश की वह राह हम ,
जो न जाती हो हमारे गाँव को ॥
रूपनारायण त्रिपाठी