Tuesday, September 30, 2008

वनराज भाटिया के गीत , स्वाति के लिए



यह पोस्ट मेरी पत्नी स्वाति के लिए है। अच्छा सुनने की आदत उन्हीं की देन है । इसमें उनसे अच्छा सुनना शामिल है । दशकों से खराब रेकॉर्ड प्लेयर के कारण इनमें से ज्यादातर गीतों को सुनना नामुमकिन था । इन्टरनेट पर ये गीत मिले तब , जब 'तुम्हारे बिन जी ना लगे घर में ' (पेश संग्रह का एक गीत) की हालत में मैं अभी हफ़्ते भर अकेला था । एक शैक्षणिक अन्तर्राष्ट्रीय कॉन्फेरेंस में शरीक होने वे हैदराबाद गयी थीं । आज ही लौटी हैं ।

जब श्याम बेनेगल ने फिल्में बनानी शुरु कीं तब ही मैंने अकेले फिल्में देखनी शुरु कीं थी। अंकुर , निशांत और उसके बाद भूमिका , मंथन,मण्डी आदि । लगता था ऐसी ही फिल्में आयें । अनन्त नाग , साधू मेहर,शबाना आज़मी, गिरीश कर्नाड ,नासिरुद्दीन शाह,अमोल पालेकर ,स्मिता पाटिल , मोहन अगाशे,कुलभूषण खरबन्दा , अमरीश पुरी जैसों का श्रेष्ठ अभिनय ! भुपेन्द्र ,प्रीति सागर ,चन्द्रू आत्मा (सी.एच. आत्मा के पुत्र ),सरस्वती राणे , उत्तरा केलकर,फिरोज दस्तूर जैसे गायक -गायिका । गोविन्द निहलानी पहले बेनेगल के कैमेरा को संभालते थे फिर खुद निर्देशक हो गए ।

बेनेगल की फिल्मों में संगीत दिया अत्यन्त प्रतिभासम्पन्न वनराज भाटिया ने । मुम्बई में और विलायत में पश्चिमी संगीत की तालीम हासिल करने और दिल्ली विश्वविद्यालय में संगीतशास्त्र के अध्यापक रहने के बावजूद इन्होंने भारतीय संगीत की लोक परंपराओं को पकड़ा , उसका इतना खूबसूरत इस्तेमाल किया कि वह कत्तई कृत्रिम नहीं लगता । हैदराबाद के आसपास की दक्खन परम्परा , मराठी लावणी और नाट्य संगीत और गुजरात-राजस्थान की लोक संगीत परम्परा के साथ साथ शास्त्रीय संगीत का प्रयोग । इन गीतों में इन आंचलिक बोलियों और धुनों को भी आप सुन पायेंगे ।






          

           

      

     

        
 

     

     



गीतों के विवरण जितना जुटे दिए जा रहे हैं :
क्र.सं. मुखड़ा गायक / गायिका गीतकार फिल्म
१ 'मुन्दर बाजू ,भाग १' सरस्वती राणे ,मीना फाटखेकर --- भूमिका
२ 'मुन्दर बाजू , भाग २' सरस्वती राणे ,उत्तरा केलकर ---- भूमिका
३ 'घट-घट में राम रमैय्या' फिरोज़ दस्तूर ---- भूमिका
४ 'मेरा जिचकीला बालम ना आया' भूपेन्द्र,प्रीति सागर एवं साथी, वसंत देव भूमिका
५ 'मेरी जिन्दगी की कश्ती' चन्द्रू आत्मा, राजा मेंहदी अली खां भूमिका
६ 'मेरो गांव काँठा पारे' प्रीति सागर, नीति सागर मंथन
७ 'पिया बाज प्याला पीया जाय ना' प्रीति सागर, मोहम्मद कुली कुतुब शाह, निशांत
८ 'पिया तुज आशना हूं मैं' भूपेन्द्र, मोहम्मद कुली कुतुब शाह निशांत
९ 'सावन के दिन आये सजनवा' प्रीति सागर, मजरूह सुल्तानपुरी भूमिका
१० 'तुम्हारे बिन जी ना लगे घर में' प्रीति सागर, मजरूह सुल्तानपुरी भूमिका

नोट : नमूने और नुमाइन्दगी के लिए ये गीत प्रस्तुत किए गए हैं । विधिवत श्रवण के लिए सीडी खरींदें ।

ईद और दुर्गा पूजा के लिए मुबारकबाद !

Wednesday, September 24, 2008

मीर, दाग़ , मोमिन,शक़ील / बेग़म अख़्तर

उलटी हो गयीं सब तदबीरें कुछ ना दवा ने काम किया
देख़ा इस बीमारि-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

अहदे जवानी रो-रो काटी ,पीर में लें आखें मूँद
यानी रात बहुत थे जागे , सुबह हुई आराम किया

नाहक़ हम मजबूरों पर यह तोहमत है मुख़्तारी की
चाहते हैं सो आप करे हैं , हमको बस बदनाम किया

या के सुफ़ेद-ओ-स्याह में हम को दख़ल जो है सो इतना है
रात को रो-रो सुबह किया , या दिन को ज्यूं त्यूं शाम किया

मीर के दीन-ओ-मजहब को अब पूछते क्या हो उन ने तो
कश्का खींचा , दैर में बैठा , कब का तर्क इस्लाम किया ।
- मीर तक़ी मीर



उज्र आने में भी है , पास बुलाते भी नहीं
बाएस-ए-तर्के मुलाक़ात बताते भी नहीं

ख़ूब परदा है के चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

ज़ीस्त से तंग हो ऐ दाग़ तो जीते क्यों हो
जान प्यारी भी नहीं , जान से जाते भी नहीं
- दाग़




वो जो हम में तुम में क़रार था ,तुम्हें याद हो के ना याद हो
वही यानी वादा निबाह का ,तुम्हें याद हो के ना याद हो

वो नये गिले वो शिकायतें वो मजे मजे की हिकायतें
वो हर एक बात पे रूठना तुम्हें याद हो के ना याद हो

कोई बात ऐसी अगर हुई जो तुम्हारे जी को बुरी लगी
तो बयाँ से पहले ही भूलना तुम्हें याद हो के ना याद हो

सुनो ज़िक्र है कई साल का , कोई वादा मुझ से था आप का
वो निभाने का तो ज़िक्र क्या,तुम्हें याद हो के ना याद हो

कभी हम में तुम में भी चाह थी ,कभी हम से तुम से भी राह थी
कभी हम भी तुम भी थे आशना,तुम्हें याद हो के न याद हो


हुए इत्तेफ़ाक़ से ग़र बहम,वो वफ़ा जताने को दम-ब-दम
गिला-ए-मलामत-ए-अर्क़बा,तुम्हें याद हो के ना याद हो

वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे बेशतर,वो करम के हाथ मेरे हाथ पर
मुझे सब हैं याद ज़रा ज़रा,तुम्हें याद हो के ना याद हो

कभी बैठे सब हैं जो रू-ब-रू तो इशारतों ही से गुफ़्तगू
वो बयान शौक किआ बरामला तुम्हें याद हो के ना याद हो

वो बिगाड़ना वस्ल की रात का , वो ना मानना किसी बात का
वो नहीं नहीं की हर आन अदा,तुम्हें याद हो के न याद हो

जिसे आप गिनते थे आशना जिसे आप कहते थे बावफ़ा
मैं वही हूँ 'मोमिन'-ए-मुब्तला ,तुम्हें याद हो के न याद हो
- मोमिन




मेरे हमनफ़स , मेरे हमनवा,
मुझे दोस्त बन के दग़ा ना दे
मैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँ-वलब,
मुझे जिन्दगी की दुआ न दे

मेरे दाग़-ए-दिल से है रोशनी ,
इसी रोशनी से है जिन्दगी
मुझे डर है ऐ मेरे चारागर,
ये चिराग़ तू ही बुझा न दे

मुझे छोड़ दे मेरे हाल पर ,
तेरा क्या भरोसा है चारागर
ये तेरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर,
मेरा दर्द और बढ़ा न दे

मेरा अज़्म इतना बुलन्द है
के पराये शोलों का डर नहीं
मुझे ख़ौफ़ आतिश-ए-ग़ुल से है,
ये कहीं चमन को जला न दे

वो उठे हैं लेके होम-ओ-सुबू,
अरे ओ 'शकील' कहाँ है तू
तेरा जाम लेने को बज़्म में
कोई और हाथ बढ़ा न दे !
- शकील बदायूँनी


Thursday, September 18, 2008

आशा नहीं लता/चुलबुला-सा गीत/टैक्सी ड्राइवर/एसडी बर्मन/साहिर

१९५४ की नवकेतन की फिल्म । देवानन्द , कल्पना कार्तिक ,शीला रमानी , जॉनी वॉकर ।

दिल से मिला के दिल ,प्यार कीजिए
कोई सुहाना इक़रार कीजिए

शरमाना कैसा ,घबड़ाना कैसा
जीने से पहले , मर जाना कैसा
फ़ासलों की छाँव में ,
रस भरी फ़िज़ाओं में
इस जिन्दगी को गुलज़ार कीजिए

आती बहारें , जाती बहारें
कब से खड़ी हैं , बाँधे कतारे
छा रही है बेखुदी
कह रही है ज़िन्दगी
दिल की उमंगे बेदाद कीजिए


दिल से भुला के ,रुसवाइयों को
जन्नत बना लें , तनहाइयों को
आरज़ू जवान है
वक़्त महरबान है
दिल खो न जाये , खुशी यार कीजिये,दिल से...



डाउनलोड करें

दिल ढूँढता है सहारे सहारे/मुकेश/दुर्लभ

मुकेश का यह दुर्लभ एकल गीत सुनें :


Sunday, September 14, 2008

मुझसे पहली-सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग/फ़ैज़/नूरजहाँ

मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब ना मांग

मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शा है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झ़गडा़ क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है

तू जो मिल जाये तो तकदीर निगूं हो जाए
यूं न था, मैंने फ़कत चाहा था यूं हो जाए

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशमों- अतलसो- कमख्वाब में बुनवाये हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
खाक में लिथडे़ हुए, ख़ून में नहलाए हुए

जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से

लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना मांग !
- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
गायिका - नूरजहाँ

Friday, September 12, 2008

तलत के स्वर में रफ़ी का गाया गीत

५० के दशक में पश्चिम में अंग्रेजी के लोकप्रिय गीतों के बारे में एक परम्परा थी । ग्रामाफोन कम्पनियाँ 'हिट गीत' को अन्य लोकप्रिय कलाकारों से भी गवाते थे और उसके ग्रामाफोन रेकॉर्ड भी जारी करते थे । इसके देखा-देखी एच.एम.वी ने भारत में भी यह प्रयोग आजमाया । प्रयोग व्यापक न हो सका ।
बहरहाल चित्रगुप्त के संगीत निर्देशन में बनी 'भाभी' फिल्म का 'चल उड़ जा रे पंछी , अब ये देश हुआ बेगाना ' अपने जमाने का हिट गीत था । यह गीत फिल्म में मोहम्मद रफ़ी द्वारा गाया गया है । एच.एम.वी ने ७८ आर.पी.एम (बहुत तेज चलने वाले मोटे रेकॉर्ड ) के रेकॉर्ड में इस गीत को तलत महमूद की आवाज़ में भी पेश किया ['Version Recording FT21027 Twin/Black Label 78 RPM'] ।
संगीत के रसिक डॉ. बुखारी ने इस दुर्लभ गीत को यू ट्यूब में पेश किया है ,तलत साहब के कुछ दुर्लभ चित्रों के साथ । यहाँ यह बता देना उल्लेखनीय है कि मुकेश की तरह तलत महमूद ने कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया था ।

पहले सुनें तलत महमूद के स्वर में



फिर मोहम्मद रफ़ी के स्वर में :

Wednesday, September 10, 2008

--जो न जाती हो हमारे गाँव को / रूपनारायण त्रिपाठी

श्यामबहादुर 'नम्र' हमारे जीजा सदृश हैं । वरिष्ट सामाजिक कार्यकर्ता और कवि । युवा पत्रकार और चिट्ठेकार अमन के पिता। हमने बचपन में श्यामबहादुर भाई से एक छोटी-सी-कविता सीखी थी , रूपनारायण त्रिपाठी द्वारा रचित । इस साल लाल किले की प्राचीर से चाँद पर जाने के अभियान की मनमोहन सिंह जब घोषणा कर रहे थे तब से रह-रह कर इस कविता की याद आती है । हमने जब इसे सीखा था तब अपोलो अभियान शुरु हो चुका था लेकिन चाँद पर मानव-भ्रमण नहीं हुआ था ।

यह तुम्हारी सभ्यता का काफ़िला,
आजमाने चाँद की दूरी चला ।
किन्तु जीवन में न तय हो पा रहा ,
आदमी और आदमी का फाँसला ॥

तुम अतल गहराइयों में नापते ,
फाँसला सुनसान से सुनसान का ।
किन्तु जीवन में न तय हो पा रहा ,
आँसुओं से फाँसला मुस्कान का ।

क्या करें वह चन्द्रमा का देश हम ,
जो अगम लगता हमारे पाँव को ।
क्या करें आकाश की वह राह हम ,
जो न जाती हो हमारे गाँव को ॥
रूपनारायण त्रिपाठी


Monday, September 8, 2008

आदमी को प्यार दो / नीरज

नीरज मंचीय गीतकार रहे हैं और फिल्मी भी । अपनी रचनाओं को वे अपनी धुन में ही कवि सम्मेलनों - मुशायरों में सुनाते थे। आज जो गीत यहाँ पेश है उसकी धुन शायद कवि सम्मेलन वाली ही होगी । हमने तरुण शान्ति सेना के साथियों से ही इसे सीखा था । भवानीप्रसाद मिश्र के गीत की इन पंक्तियों को मन में रख कर बेझिझक पेश कर रहा हूँ :
सुरा-बेसुरा कुछ न सोचेंगे आओ ।
कि जैसा भी सुर पास में है चढ़ाओ ॥

प्रिय श्रोताओं से गुजारिश है कि पूरा गीत सुनिएगा ।




गीत डाउनलोड हेतु

Thursday, September 4, 2008

'यही वो जगह है' / धुन जो स्पैम नहीं थी

' यही वो जगह है ' इस गीत की धुन ईमेल से मिली तब मैं थोड़ा चौंका । मुझे लगा मेरे एक ब्लॉग के नाम का 'संलग्नक' ( एक 'है' की कमी है ) , प्रेषक का नाम नचिकेता । परिचित नामों से भी स्पैम आ जाते हैं और यह तो मेरे सगे बड़े भाई का नाम था । तब तक भाई साहब ने बताया कि यह १९६६ की फिल्म 'वो रात फिर ना आयेगी' की धुन है , विश्वजीत और शर्मीला ठाकुर मुख्य कलाकार थे , १५ साल की अवस्था में ममेरे बड़े भाई कबीर चौधरी के साथ कटक में घर पर बिना बताए यह फिल्म देखी थी , कुछ जासूसी टाइप कहानी थी , पिक्चर चली नहीं थी लेकिन सभी गीत बहुत लोकप्रिय हुए थे और विश्वजीत के देखादेखी इन्टरवेल में सिगरेट भी पी गई थी ।

किशोर वय के दोनों भाई आगे चल कर शौकिया संगीत से जुड़े़ । कबीर ने पहले गिटार और बाद में सरोद बजाना शुरु किया । नचिकेता ने माउथ ऑर्गन बजाना शुरु किया । नचिकेता ने गुजरात के माउथ ऑर्गन बजाने वालों के एक क्लब (कड़ी उनके लोकप्रिय ब्लॉग की है) के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है । क्लब से जुड़े लोग सब शौकिया बजाने वाले हैं । बिना सहयोगी वाद्यों के धुन बजाते हैं । एक जापानी माउथ ऑर्गन निर्माता कम्पनी ने प्रतिमाह इस क्लब के ब्लॉग को दो हजार रुपए का विज्ञापन देना तय किया है ।


yeh hi voh jagah h...

Monday, September 1, 2008

शमशेरराज कपूर और चाँद उस्मानी की जीवन ज्योति

शम्मी कपूर का मूल नाम शमशेरराज कपूर था । १९४८ में अपने पिता की थियेटर कम्पनी में ५० रुपये दरमाह पर एक जूनियर एक्टर के रूप में आपने काम शुरु किया । १९५३ में बनी 'जीवन ज्योति' उनकी बतौर हीरो पहली फिल्म थी और उसमें उनकी नायिका चाँद उस्मानी थीं । शम्मी कपूर भारत में इन्टरनेट प्रयोक्ताओं में अग्रणी रहे हैं तथा Internet Users Community of India के संस्थापक अध्यक्ष रहे हैं ।

'पहेली' में जो गीत दिखाया गया है उसे अन्त तक कम ही लोगों ने सुना । इसलिए पुरुष स्वर के बारे में बताने की जरूरत नहीं समझी । पुरुष स्वर के बारे में तीन पाठकों ने ही जवाब दिए - ममता , नचिकेता और विनय जैन । ममताजी ने आशा भोंसले का स्त्री स्वर अन्य कई प्रतिभागियों की भांति सही पहचाना लेकिन पुरुष स्वर पहचानने में चूक गयीं । पुरुष स्वर जो गीत के अन्तिम हिस्से में है वह अभिनेता का खुद का स्वर है - शम्मी कपूर का । इस प्रकार गायक और गायिका दोनों के स्वर पहचानने वाले विनय जैन ( v9y ) और नचिकेता हैं ।

सिर्फ़ स्त्री -स्वर को सही पहचानने वाले पारुल , ममता , मनीष तथा स्मार्ट इण्डियन ।

दिनेशराय द्विवेदीजी और ममताजी ने गीत की मिठास को पसन्द किया ।

इस गीत में आशाजी का स्वर लता मंगेशकर के शुरुआती गीतों से कितना निकट है ! ओ.पी. नैय्यर साहब के संगीत निर्देशन में आशा भोंसले की अपनी स्वतंत्र पहचान और छाप वाले गीत बाद में आए । शम्मी कपूर को पहचानने में ममता चूकीं , उन्हें वे राज कपूर लगे । इसीलिए मुकेश और रफ़ी के बीच मुकेश चुनना उन्हें लाजमीतौर पर 'सही' लगा ।

ममताजी , सभी टिप्पणियां आज अनुमोदित हो गयी हैं । दिनेशजी ने सिर्फ़ गीत की मिठास पर राय व्यक्त की थी इसलिए पहले छपी ।

Saturday, August 30, 2008

'चाँदनी की पालकी में बैठकर' - पहेली

' चाँदनी की पालकी में बैठकर , कोई आने वाला है ' इस गीत को आप पूरा सुनें तथा देखें भी । आप को गायक - गायिका का नाम बताना है । गीत की विशेषता पर टिप्पणियाँ भी सादर आमंत्रित हैं । धुन सचिन देव बर्मन की है तथा गीत साहिर लुधियानवी का है ।
जवाब से इतर टिप्पणियों के लिए समय सीमा नहीं है । जवाब परसों यानी १ सितम्बर की सुबह तक लिए जाएंगे ।

Wednesday, August 27, 2008

मुकेश के स्वर में

कल श्रोता बिरादरी ने सूचना दी कि आज मुकेश की पुण्य तिथि है । संगीत वाले चिट्ठों ने मुकेश के गीत प्रस्तुत किए हैं । मैं भी अपनी पसन्द के कुछ गीत और विडियो प्रस्तुत कर रहा हूँ , उम्मीद है आप को भी पसन्द हों ।

Monday, August 25, 2008

विडियो पहेली परिणाम के बहाने 'बिन्दी'- चर्चा

२३ अगस्त को मैंने एक विडियो पहेली इसी ब्लॉग पर पूछी थी । पाँच मित्रों ने भाग लिया , जिनके उत्तर उसी पोस्ट की टिप्पणी के रूप में आज प्रकाशित कर दिए गए हैं । पाँचों मित्रों का मैं आभारी हूँ ।
यह गीत पहली बार सुना तब मुझे किसी भी भारतीय गीत से जुदा नहीं लगा । गीत मुझे काफ़ी मधुर लगा था और नायक-नायिका भी खुशनुमा लगे । मुझे तलत महमूद साहब की थोड़ी थोड़ी याद आई । फिर भाई साहब से चर्चा हुई तो उन्होंने बताया कि तलत साहब ने अभिनय भी किया है । इस कड़ी पर जाइएगा तो आपको तलत साहब की खुशनुमा तसवीरें मिलेंगी।
'हिन्दी फिल्मों को घोल कर पीए हुए' दिलीप कवठेकर साहब ने सब से विस्तृत उत्तर दिया । यह भारतीय नहीं है इस बात पर वे इन कारणों से आए :
"य़ह किसी भी हिंदुस्तानी फ़िल्म का गाना नही हो सकता. परिवेश, चेहरों के सांचे, माथे पर बिंदिया लिये एक भी महिला नही, कोई भी पहचान की सूरत नही, एक्स्ट्रा में भी नही."

उनके बताये कारण में दो बातें खटकी । 'चेहरों के सांचे' और 'माथे पर बिन्दिया लिये एक भी महिला' का न होना ! भारत , पाकिस्तान और बांग्लादेश के चेहरों के साँचों में अन्तर ! दिलीप भाई कभी स्पष्ट करेंगे । बिन्दिया वाली बात पर मेरी पत्नी डॉ.स्वाति ने कहा कि हिन्दू महिलाएं बिन्दी न लगाना अशुभ मानती हैं और इसीलिए मुस्लिम महिलाएं लगाना । इससे लगा कि क्या यह कोई धार्मिक फर्क है ? खोज शुरु की तो पता चला कि खोजा मुस्लिम महिलाएं ,बांग्लादेशी मुस्लिम महिलाएं तथा कर्नाटक की मुस्लिम महिलाएं तो व्यापक तौर पर बिन्दी लगाती हैं । फिर पाकिस्तानी पंजाबी गीत मिले बिन्दिया वाले और बांग्लादेशी भी । पाकिस्तान में एक अभिनेत्री का नाम भी बिन्दिया है । फिल्मी दाएरे से ऊपर उठने पर रूहानी और आध्यात्मिक पुट लिए - 'छाप तिलक सब छीनी रे,मों से नैना मिलाइके' तो भारत-पाक दोनों देशों में गाया जाता है ।
अब इससे उलट बात की पुष्टि करने की सोची - क्या भारतीय फिल्मों की नायिकाएं अनिवार्य तौर पर बिन्दी लगाती हैं? दो पसन्दीदा नए गीतों को सुना/देखा । दोनों की हिरोइनें बिना बिन्दी लगाए थीं । बिन्दी का मामला सांस्कृतिक प्रतीत हुआ , धार्मिक से ज्यादा ।
दो बांग्लादेशी गीत (सबीना यास्मीन और सलमा अख़्तर के विडियो );

पाकिस्तानी पंजाबी गीत :

और भारतीय फिल्म 'कभी अल्विदा न कहना' तथा 'लाइफ़ इन ए मेट्रो ' के गीत :


Saturday, August 23, 2008

एक विडियो पहेली

फिल्मी गीतों पर एक पहेली मैंने पहले पेश की थी । लोगों ने काफ़ी रुचि दिखाई थी । उस चिट्ठे (शैशव) पर अब तक की सर्वाधिक देखी गयी पोस्ट थी वह । विडियो चढ़ाना सीखने के बाद यह एक प्रश्न वाली पहेली प्रस्तुत है । एक मधुर गीत प्रस्तुत है । गीत के बारे में टिप्पणी तो आमंत्रित है ही सवाल भी पूछ रहा हूँ -
गीत कैसा लगा ? यह गीत किसने गाया है ? किस फिल्म का है ?दूसरे और तीसरे प्रश्न के उत्तर वाली टिप्पणियाँ २५ अगस्त को प्रकाशित होंगी ।


लचक - लचक चलत मोहन

इस चिट्ठे को शुरु करते वक्त कहा गया था कि सुरा-बेसुरा दोनों सुनाया जाएगा । यह गीत करीब ३३ वर्ष पहले सीखा था । मैं चाहता था कि जिनसे सीखा था उनके सुन्दर स्वर में प्रस्तुत कर सकूँ । यह संभव नहीं हुआ है ।
जन्माष्टमी के अवसर पर इसे झेल जाँए ।

एरी दैय्या , लचक लचक चलत मोहन, आवे,मन भावे




अधर अधर ,मधुर मधुर ,मुख से बंसी बजावे दैय्या ।




श्रवण कुण्डल ,चपल तोय ,मोर-मुकुट ,चन्द्र किरन




मन्द हसत, जीया में बसत ,सूरत मन रिझावे दैय्या॥

Friday, August 22, 2008

'शाम' पर चार मधुर फिल्मी गीत

डी. वी. पलुस्कर को सुनने वाले जो हिन्दी चिट्ठों पर पहुंचते हैं , अभी कम हैं । ऐसे में फिल्मी गीत सुनें :



हुई शाम उनका खयाल आ गया - मेरे हमदम मेरे दोस्त 

 रोज शाम आती थी - इम्तेहान


 दिन ढल जाए - गाइड

 वो शाम कुछ अजीब थी - ख़ामोशी



Wednesday, August 20, 2008

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय रागों के नमूने : डी .वी. पलुस्कर

दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर का परिचय इस ब्लॉग के श्रोताओं को है । उनके गायन की तीन पोस्ट यहाँ पेश हो चुकी हैं । श्री संजय पटेल के अनुरोध ( तिलक कामोद ) पर यहाँ राग विभास , मालकौंस अदि यहाँ प्रस्तुत किए जा रहे हैं । सुधी श्रोता वृन्द रसास्वादन करेंगे ।

Tuesday, August 19, 2008

भजन / पलुस्कर / ई-स्वामी के नाम

डी. वी. पलुस्कर के गायन की प्रस्तुति पूर्व में भी की थी । इस बार ज्यादा प्रसिद्ध भजन प्रस्तुत हैं । बरसों बाद लताजी ने भी इन भजनों को उन्हीं धुनों में गाया ।
इस बार यह भजन विडियो के रूप में मिले थे , जिन्हें मैंने डाउनलोड किया रियल प्लेयर की मदद से । इससे मैं उन्हें बिना व्यवधान ( बफ़रिंग की वजह से ) सुन सकता हूँ । यूट्यूब वाले कई बार विडियो हटा देते हैं , तब भी आप द्वारा प्रकाशित विडियो अन्तर्ध्यान हो जाता है । इसके बाद मैं परेशान रहा कि इन्हें अपने चिट्ठे पर चढ़ाने की क्या तकनीक हो , उपाय हो ? 'ब्लॉगर' वाले लम्बे - लम्बे ब्लॉगर आई.डी दे कर 'समर्थन' से सम्पर्क का उपदेश दे रहे थे । इसी बीच हिन्दी चिट्ठेकारी की प्रणेताओं में एक श्री ई-स्वामी ने मुझे इसका समाधान बताया । प्रयोग उन्हींके नाम समर्पित है ।
प्रस्तुति पर राय विशेष रूप से आमंत्रित है ।