Friday 4 July 2008

पलुस्कर का मधुर गायन

पंडित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर सिर्फ़ दस साल के थे जब उनके पिता विष्णु दिगम्बर पलुस्कर नहीं रहे। पं. विनायकराव पटवर्धन तथा पं नारायणराव व्यास से उन्होंने गायन सीखा। १४ वर्ष की अवस्था में हरवल्लभ संगीत सम्मेलन (पंजाब) में प्रथम प्रस्तुति का मौका मिला। उन्होंने ग्वालियर घराने को अपनाया लेकिन अन्य घरानों की विशिष्टताओं को भी ग्रहण किया। उनकी आवाज अत्यन्त मधुर और कर्णप्रिय थी।
उनके भजन तथा उस्ताद अमीर खान साहब के साथ बैजू बावरा फिल्म में जुगलबन्दी भी अत्यन्त प्रसिद्ध हैं।
३४ वर्ष की अल्पायु में मस्तिष्क ज्वर से उनकी मृत्यु हुई।
'आगाज़' के सुधी श्रोता इस अमर गायक के गायन का रसास्वादन करेंगे ।
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4 comments:

  1. इस लाजवाब उपहार के लिए आपके प्रति किस तरह आभार प्रकट करूं . पलुस्कर जी की स्वर-लहरी पर सवार होकर मैं उस अतीन्द्रिय जगत में पहुंच गया जहां मैं कुछ देर के लिए ही सही अपने पिता का हाथ थामे बैठा रहा . उन पिता का जो अब इस दुनिया में नहीं हैं .

    पं. डी.वी.पलुस्कर द्वारा राग झिंझोटी में गाया सूरदास का पद 'अंखियां हरि दरसन की प्यासी' पिता जी,जिन्हें हम सब भाई-बहन बड़े चाचा कह कर पुकारते थे, की सर्वाधिक प्रिय रचनाओं में एक था . सो मैंने भी इसे कई बार सुना .

    पुनः आपके प्रति आभार व्यक्त करता हूं .

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  2. ठुमकी चलत रामचंद्र,पायो जी मैने रामरतन धन पायो,चालो मन गंगा जमुना तीर,जानकीनाथ सहाय करे जब कौन बिगाड़ करे नर तेरो और रघुपति राघव राजा राम जैसे कितनी ही भक्ति रचनाओं के प्रति पलुस्करजी ने मुझ जैसे लोगों को अपने सुर से आकर्षित किया.उनको सुनते सुनते ही ये पद याद भी हो जाते थी.ग्वालियर घराने की गायकी का ये अप्रतिम गायक जल्दी ही इस लौकिक संसार से चला गया लेकिन हम सब की मानस-स्मृति से नहीं.

    दुर्भाग्य की बात है कि ऐसे विलक्षण गायक की स्मृति में ऐसा कुछ भी नहीं इस देश में जो पलुस्करजी के नाम को अगली पीढ़ी के मन में आदर का भाव जगा सके.फ़िल्म बैजू-बावरा तो उनकी गान-प्रतिभा का एक छोटा सा पहलू है , वे इससे ऊपर भारतीय शास्त्रीय संगीत के दमकते नक्षत्र थे.आपने उनका स्मरण कर पुण्य अर्जित कर लिया.

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  3. धन्यवाद अफलातून जी और ये लिन्क भी देखियेगा
    http://www.lavanyashah.com/
    ( अमेरिका में जो लावण्याजी ने देखा वो आपको भी दिखा रही हैं। देखिये दिलकश नजारे।)
    -लावण्या

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