Monday, April 6, 2009

राग देश में तराना : उस्ताद राशिद खान

परसों तक विदुषी वीणा सहस्रबुद्धे विविध भारती के ’संगीत सरिता’ में ’तरानों’ से परिचय करा रही थीं । ज्यादातर हमारी काशी के पद्मश्री पंडित बलवन्तराय भट्ट जी द्वारा तैय्यार तराने सुनाये,उन्होंने ।
उसी प्रक्रिया में मुझे उस्ताद राशिद खान साहब का ,राग देश में यह तराना मिल गया । उम्मीद है आप को भी पसन्द आयेगा ।

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7 comments:

  1. bahut hi badhiya. maza aa gaya. kya hum ise download kar sakte hain?

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  2. बहुत शानदार, देस राग एक अलौकिक सी अनूभूति करवाता है।

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  3. तराने किसी भी राग में हो, पर्शियन शब्दों के बिना अधुरे लगते है जिसका प्रचार सब से ज्यादा उस्ताद अमिरखां साहब ने और बाद में श्री गोकुलोत्सव महाराज ने किया है । हर एक बोल का अर्थ है । हर तराने में अमीर खुसरो साह्ब ने दो दो लाईन पर्शियन में सहुलियत के लिये नहीं लेकिन अर्थसभर तरीके से बनाई थी जिससे गाने को आध्यात्मिक उंचाई या इश्क की चरमसीमा मिले (इश्के माशुकी से ज्यादा हकीकी पे मदार रखा) फिर भी कहीं तो ईश्क आना ही था । उदाहरण मेघ राग का तराना

    अब्रे तर सहिनी चमन, बुलबुलो गुल फसले बहार
    साकि ओ मुतरिब ओ मय, यार बे साहिनी, गुलज़ार

    भावनगर के वासी बलवंतराय भट्ट जो कि अंध होते हुए भी काफी काम कर रहे है और अब तो उनकी 'भावरंग लहिरी' भी प्रकाशित हो चुकी है, उन का काम बडा रसप्रद और बेजोड है ।

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  4. Bhavesh N. PattniJuly 8, 2010 at 3:36 PM

    तराने किसी भी राग में हो, पर्शियन शब्दों के बिना अधुरे लगते है जिसका प्रचार सब से ज्यादा उस्ताद अमिरखां साहब ने और बाद में श्री गोकुलोत्सव महाराज ने किया है । हर एक बोल का अर्थ है । हर तराने में अमीर खुसरो साह्ब ने दो दो लाईन पर्शियन में सहुलियत के लिये नहीं लेकिन अर्थसभर तरीके से बनाई थी जिससे गाने को आध्यात्मिक उंचाई या इश्क की चरमसीमा मिले (इश्के माशुकी से ज्यादा हकीकी पे मदार रखा) फिर भी कहीं तो ईश्क आना ही था । उदाहरण मेघ राग का तराना

    अब्रे तर सहिनी चमन, बुलबुलो गुल फसले बहार
    साकि ओ मुतरिब ओ मय, यार बे साहिनी, गुलज़ार

    भावनगर के वासी बलवंतराय भट्ट जो कि अंध होते हुए भी काफी काम कर रहे है और अब तो उनकी 'भावरंग लहिरी' भी प्रकाशित हो चुकी है, उन का काम बडा रसप्रद और बेजोड है ।

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  5. तराने किसी भी राग में हो, पर्शियन शब्दों के बिना अधुरे लगते है जिसका प्रचार सब से ज्यादा उस्ताद अमिरखां साहब ने और बाद में श्री गोकुलोत्सव महाराज ने किया है । हर एक बोल का अर्थ है । हर तराने में अमीर खुसरो साह्ब ने दो दो लाईन पर्शियन में सहुलियत के लिये नहीं लेकिन अर्थसभर तरीके से बनाई थी जिससे गाने को आध्यात्मिक उंचाई या इश्क की चरमसीमा मिले (इश्के माशुकी से ज्यादा हकीकी पे मदार रखा) फिर भी कहीं तो ईश्क आना ही था । उदाहरण मेघ राग का तराना

    अब्रे तर सहिनी चमन, बुलबुलो गुल फसले बहार
    साकि ओ मुतरिब ओ मय, यार बे साहिनी, गुलज़ार

    भावनगर के वासी बलवंतराय भट्ट जो कि अंध होते हुए भी काफी काम कर रहे है और अब तो उनकी 'भावरंग लहिरी' भी प्रकाशित हो चुकी है, उन का काम बडा रसप्रद और बेजोड है ।

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  6. @ intuitive_divinator ,पद्मश्री पूज्य बलवंतराय भट्ट भावनगर में पैदा हुए हों,संभव है किन्तु गत करीब ५० से अधिक वर्षों से काशी में हैं ।

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