Friday 24 July 2009

मस्ती में झूले और सभी गम भूलें : सचिन बर्मन/लता/साहिर/हाऊस नं ४४

कहते हैं कि लता मंगेशकर द्वारा इस गाने की अदायगी से गदगद होकर सचिन देव बर्मन ने अपना एक बीड़ा पान उन्हें पेश कर दिया था । पान के अपने भंडार में से एक पान घटाना वे तब ही करते जब दिल से मामला जमा हो ।
१९५५ में बनी हाउस नम्बर ४४ । साहिर लुधायनवी की सुन्दर - सहज शब्द रचना । कल्पना कार्तिक पर फिल्माया गया ।
फैली हुई हैं सपनों की बाहें , आ जा चल दें कहीं दूर
वहीं मेरी मंजिल , वहीं तेरी राहें , आ जा चल दें कहीं दूर ।
ऊँची घटा के साये तले छिप जाँए,
धुँधली फ़िज़ा में ,कुछ खोयें ,कुछ पायें ।
साँसों की लय पर , कोई ऐसी धुन गायें,
दे दे जो दिल को दिल की पनाहें ॥ आ जा चल दें...

झूला ढलकता ,घिर घिर हम झूमें,
अम्बर तो क्या है , तारों के भी लब चूमें ।
मस्ती में झूलें और सभी गम भूलें ,
पीछे न देखें मुड़ के निगाहें ॥ आ जा चल दें
साहिर लुधियानवी

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4 comments:

  1. बहुत बढिया गीत है !!

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  2. An All Time Favourite Sir... Thanks for making this evening romantic.

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  3. इस गीत में --ऊँची घटा के साये तले --में सुनने में 'ऊँची' नहीं सुनायी देता..उधे//उदी>सुनता है ...यह क्या शब्द है?क्या आप बता सकते हैं?

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