Thursday 2 July 2009

तीन सदाबहार कव्वालियां

तीन सदाबहार फिल्मी कव्वालियाँ प्रस्तुत हैं । लोग- बाग पसन्द करेंगे तो और पेश करने का साहस करूँगा । इन कव्वालियों का रुहानी अर्थ पहले नहीं दिखता था । यह मत सोचिएगा कि बुढ़ौती का परिणाम है- दिखने लगना । लोकनायक जयप्रकाश बताते थे कि किशोर और तरुणों के लिए भी आध्यात्मिकता की तमाम मिसालें दे कर ।

ये है इश्क - इश्क

न तो कारवाँ की तलाश है

कहीं दाग न लग जाए

3 comments:

  1. तीनो कव्वालियाँ लाजवाब हैं...इश्क इश्क ने तो इतिहास रच डाला है...ऐसी कव्वाली न कभी इस से पहले सुनी और ना बाद में...क्लासिक की श्रेणी में आती है ये कव्वाली...बाकि की दो भी कमाल की हैं...अब फिल्मों में कभी कभार ही कोई कव्वाली सुनाई देती है लेकिन उसका असर दिल पे गहरे नहीं होता...फिल्में ही क्या कव्वाली के शौकीन भी अब कहाँ रहे...नुसरत साहेब ने बहुत काम किया इस विधा पर और उसे उसका पुराना मकाम भी वापस दिलाया लेकिन उनके बाद...हाल ख़राब ही है.
    नीरज

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  2. तीनों कव्वालियां जबर्दस्त हैं . पर ’इश्क इश्क’ की बात ही कुछ और है . हर दृष्टि से अद्भुत रचना है . नीरज भाई सही कह रहे हैं . हमारी गंगा-जमनी तहजीब का सदाबहार ’क्लासिक’ है यह कव्वाली .

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  3. भाई मज़ा आ गया और भी सुनाईये...हम ततो तैयार बैठे हैं।

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पसन्द - नापसन्द का इज़हार करें , बल मिलेगा ।