Friday, 12 December, 2008

महुआ घटवारिन जैसे अनिल रघुराज को

हिन्दी चिट्ठालोक के दृढ लेखक अनिल रघुराज एक लम्बे अन्तराल के बाद लौटे हैं । खुद की तुलना महुआ घटवारिन से उन्होंने की ,यह दिल को छू गया । अपनी मीता (वहीदा रहमान ) को महुआ घटवारिन की कहानी सुनाता हीरामन ( राज कपूर )अनिल को बार बार याद आ रहा है ।
अनिल द्वारा फिर से चिट्ठाकारी की शुरुआत को समर्पित उनका प्रिय यह गीत यहाँ प्रस्तुत हैं :

8 comments:

  1. अनिल जी की वापसी का इंतजार था। आप ने उन का सही स्वागत किया है। मैं भी आप के साथ हूँ।

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  2. अनिल रघुराज का गायब होना हमें भी बहुत खल रहा था. उनका वापिस लौटना भी सुखद लगा और यह गीत भी

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  3. वाकई, आंखें छलक आईं यह गीत सुनकर। अफलातून भाई तहेदिल से आपका शुक्रिया। और मैथिली जी और दिनेश जी, आप लोगों का आशीर्वाद रहा तो महुआ घटवारिन को कोई सौदागर पूरी तरह खरीद नहीं पाएगा। मेरा अपना स्पेस मुझसे कोई छीन नहीं सकता। हां, इसे बनाए रखने के लिए थोड़ी ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी। तो कर लेंगे, क्या है?

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  4. yahee to bat sukhanwaree kee. Mahua ghatwareen kee bhasha me kahun to- essssh...

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  5. अनुपस्थिति का कारण जान और यह जान कि चिट्ठा लेखन से मोह भंग कारण नहीं था अच्छा लगा । स्वागत है ।
    घुघूती बासूती

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  6. इतने सुन्दर गीत को सुनवाने के लिए धन्यवाद ।
    घुघूती बासूती

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  7. हमें भी इंतजार था...
    और ये गीत !!!!
    अफ्लूभाई...आप तो बस आप हैं।
    जिंदाबाद.....

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  8. मैं अनिल रघुराज को और उनके बारे में कुछ नहीं जानता। आज पहली ही बार उनका नाम पढा । किन्‍तु खुद को 'महुआ घटवारिन'की जगह रख देने की उनकी बात से उनके मिजाज और मन का अनुमान लगाने की चेष्‍टा कर रहा हूं। ऐसे लोग ही कुछ कर गुजरने का जज्‍बा लिए होते हैं। ऐसे लोगों की कामयाबी हम सबकी जरूरत है।
    'तीसरी कसम' मेरी प्रियतम फिल्‍मों में से एक है। इसके सात शो लगातार देखे थे और उन दिनों रोने के सिवाय और कुछ भी नहीं किया था। मूल कहानी, अपने बचपने में ही पढी थी - हिन्‍द पाकेट बुक्‍स जब शुरु ही हुई थी, तब ।
    सुनने वाले को फीनीक्‍स बना देने को आतुर कर देने वाला यह गीत सुनकर एक बार फिर उसी 'नाटेल्जिया' को जीया।
    मीठे-मीठे दर्द भरे अतीत से कौन नहीं लिपटना चहेगा?
    आपने तो आज जिन्‍दगी के कुछ लमहे सार्थक कर दिए।
    शुक्रिया।

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