Wednesday 5 November 2008

प्यास लगे तो एक बराबर...

देश की सभी नदियाँ राष्ट्रीय हैं । लेकिन गंगा तो 'प्यास लगे तो एक बराबर सब में पानी डाले' , 'नि:शब्द सदा बहने वाली'(स्व. पंडित नरेद्र शर्मा के बोल)है । उर्दू के बेनज़ीर शायर नज़ीर बनारसी गंगा जल में वजू कर नमाज अदा करने की बात कहते थे। नज़ीर बनारसी की गंगा पर वह रचना अति शीघ्र प्रस्तुत करूंगा।


6 comments:

  1. bahut umda. Aur kya kaha ja sakta hai, Bharat ki issi sanskriti ko pahchanne ki jaroorat hai.
    America can get obama, but there is no one. All the popular leaders liveing in traditional problems & no one looks the "aam aadmi" who needs bread & water, normal living standard.

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  2. काफ़ी समय बाद यह गीत फ़िर सुनने को मिला. धन्यवाद.

    कुछ वर्ष पहले गंगा पर राजनीति की थी राजिव गाँधी ने. गंगा और गन्दी हो गई. अब मनमोहन सिंह फ़िर गंगा पर राजनीति कर रहे हैं.

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  3. भूपेन दा को सुनाने के लिए आभार। बहुत अच्‍छी ब्‍लागिंग कर रहें हैं आप। बधाई।

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  4. बिना किसी भेद के गंगा स्त्री-पुरुषों, गोरो-कालों, मजहबियों-गैरमजहबियों छूत-अछूत सभी की है। लेकिन शायद भेदों के कारण ही मैली भी है।

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  5. मन प्रसन्न हो गया भाई ...

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  6. नदी कलकल स्वर से बहती है पर जब जनता हाहाकार करे तब
    नदी, नि:शब्द बहे~~~
    तब कविता प्रश्न करती है और पूछती है , "भीष्म रुपी सँतान आज का भारत कब पायेगा ? जिसे गँगा जन्म देगी जो विष्णु सहस्त्रनाम भी रचे और शर शैय्या भी सहे ? "
    बहुत सुँदर चित्रोँ के साथ इस गीत को सुनकर बहुत खुशी हुई
    - लावण्या

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