Wednesday 10 September 2008

--जो न जाती हो हमारे गाँव को / रूपनारायण त्रिपाठी

श्यामबहादुर 'नम्र' हमारे जीजा सदृश हैं । वरिष्ट सामाजिक कार्यकर्ता और कवि । युवा पत्रकार और चिट्ठेकार अमन के पिता। हमने बचपन में श्यामबहादुर भाई से एक छोटी-सी-कविता सीखी थी , रूपनारायण त्रिपाठी द्वारा रचित । इस साल लाल किले की प्राचीर से चाँद पर जाने के अभियान की मनमोहन सिंह जब घोषणा कर रहे थे तब से रह-रह कर इस कविता की याद आती है । हमने जब इसे सीखा था तब अपोलो अभियान शुरु हो चुका था लेकिन चाँद पर मानव-भ्रमण नहीं हुआ था ।

यह तुम्हारी सभ्यता का काफ़िला,
आजमाने चाँद की दूरी चला ।
किन्तु जीवन में न तय हो पा रहा ,
आदमी और आदमी का फाँसला ॥

तुम अतल गहराइयों में नापते ,
फाँसला सुनसान से सुनसान का ।
किन्तु जीवन में न तय हो पा रहा ,
आँसुओं से फाँसला मुस्कान का ।

क्या करें वह चन्द्रमा का देश हम ,
जो अगम लगता हमारे पाँव को ।
क्या करें आकाश की वह राह हम ,
जो न जाती हो हमारे गाँव को ॥
रूपनारायण त्रिपाठी


5 comments:

  1. वाह ! आदरणीय त्रिपाठी जी की याद दिला आपने मन को संवेदित कर दिया ! वे मेरे निकट के सम्ब्नधी थे और हम इस कविता को बार बार गा कर भी सुनते सुनाते रहे हैं !

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  2. बेहद सुँदर और सार्थक प्रयास
    शुभम्`
    - लावण्या

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  3. क्या करें आकाश की वह राह हम ,
    जो न जाती हो हमारे गाँव को ॥


    -आनन्द आ गया पढ़ने और सुनने में. आभार.

    -------------


    आपके आत्मिक स्नेह और सतत हौसला अफजाई से लिए बहुत आभार.

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  4. आप के विडीयो पहेली पर कुछ लिखा है, उसके उत्तर वाले पोस्ट पर.

    क्या पढकर आपके विचार से अवगत करायेंगे?

    पिताश्री हिंदी के और संस्कृत के कवि है, मगर मैं हिंदी पर थोडा कम ही पढा हुआ हूं. मगर , यह कविता उन्होने जब सुनी तो उन्होने दाद भेजी है.
    (महामहोपाध्याय डा. प्र. ना. कवठेकर)

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  5. यह तुम्हारी सभ्यता का काफ़िला,
    आजमाने चाँद की दूरी चला ।
    किन्तु धरती में न तय हो पा रहा ,
    आदमी और आदमी का फासला
    bahut khoob likha kavi ne...

    ab to chand kya mangal grah par bhi pahuchne ki taiyariyan ho rahi hain par aadmi aadmi ke beech faasle badhte hi ja rahe hain..

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