नीरज मंचीय गीतकार रहे हैं और फिल्मी भी । अपनी रचनाओं को वे अपनी धुन में ही कवि सम्मेलनों - मुशायरों में सुनाते थे। आज जो गीत यहाँ पेश है उसकी धुन शायद कवि सम्मेलन वाली ही होगी । हमने तरुण शान्ति सेना के साथियों से ही इसे सीखा था । भवानीप्रसाद मिश्र के गीत की इन पंक्तियों को मन में रख कर बेझिझक पेश कर रहा हूँ :
सुरा-बेसुरा कुछ न सोचेंगे आओ ।
कि जैसा भी सुर पास में है चढ़ाओ ॥
प्रिय श्रोताओं से गुजारिश है कि पूरा गीत सुनिएगा ।
गीत डाउनलोड हेतु
भाषाई देहातीपन शहरी भद्रलोक का
-
पिछली कड़ी> हिन्दी में शब्दकोशों की कमी… से आगे>
... टीवी चैनलों के मीडियाकर्मियों को शायद इस बात का एहसास नहीं है कि जिस
हिन्दी के बूते वे इस सशक्त माध्य...
2 hours ago



6 comments:
बहुत अच्छे ढंग से पाठ किया है.
दोपहर में सुनने के बाद अब फिर सुना. आगे भी इस तरह के कविता पाठ पोडकास्ट कीजिये.
achchi prastuti..par aisi peastuti ke sath bol likh bhi diya karein. padhte padhte sun kar anand dugna ho jata hai.
bahut acchha laga ..shukriya
लाजवाब हैँ अल्फाज़ ऐसे मानोँ दमकते हुए नगीने होँ ..अफलातून जी ..वीर रस से गुँथी हुई कविता बहुत पसँद आई ..उत्तम प्रयास है !
सुन नहीं पाया अफ्लू भाई...
प्लेयर तो चला पर आवाज़ नहीं आई। अब दूसरा ईयरफोन लगाकर सुनता हूं।
achcha laga....
Post a Comment