Monday 8 September 2008

आदमी को प्यार दो / नीरज

नीरज मंचीय गीतकार रहे हैं और फिल्मी भी । अपनी रचनाओं को वे अपनी धुन में ही कवि सम्मेलनों - मुशायरों में सुनाते थे। आज जो गीत यहाँ पेश है उसकी धुन शायद कवि सम्मेलन वाली ही होगी । हमने तरुण शान्ति सेना के साथियों से ही इसे सीखा था । भवानीप्रसाद मिश्र के गीत की इन पंक्तियों को मन में रख कर बेझिझक पेश कर रहा हूँ :
सुरा-बेसुरा कुछ न सोचेंगे आओ ।
कि जैसा भी सुर पास में है चढ़ाओ ॥

प्रिय श्रोताओं से गुजारिश है कि पूरा गीत सुनिएगा ।




गीत डाउनलोड हेतु

6 comments:

  1. बहुत अच्छे ढंग से पाठ किया है.
    दोपहर में सुनने के बाद अब फिर सुना. आगे भी इस तरह के कविता पाठ पोडकास्ट कीजिये.

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  2. achchi prastuti..par aisi peastuti ke sath bol likh bhi diya karein. padhte padhte sun kar anand dugna ho jata hai.

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  3. लाजवाब हैँ अल्फाज़ ऐसे मानोँ दमकते हुए नगीने होँ ..अफलातून जी ..वीर रस से गुँथी हुई कविता बहुत पसँद आई ..उत्तम प्रयास है !

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  4. सुन नहीं पाया अफ्लू भाई...
    प्लेयर तो चला पर आवाज़ नहीं आई। अब दूसरा ईयरफोन लगाकर सुनता हूं।

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पसन्द - नापसन्द का इज़हार करें , बल मिलेगा ।