Saturday 23 August 2008

लचक - लचक चलत मोहन

इस चिट्ठे को शुरु करते वक्त कहा गया था कि सुरा-बेसुरा दोनों सुनाया जाएगा । यह गीत करीब ३३ वर्ष पहले सीखा था । मैं चाहता था कि जिनसे सीखा था उनके सुन्दर स्वर में प्रस्तुत कर सकूँ । यह संभव नहीं हुआ है ।
जन्माष्टमी के अवसर पर इसे झेल जाँए ।

एरी दैय्या , लचक लचक चलत मोहन, आवे,मन भावे




अधर अधर ,मधुर मधुर ,मुख से बंसी बजावे दैय्या ।




श्रवण कुण्डल ,चपल तोय ,मोर-मुकुट ,चन्द्र किरन




मन्द हसत, जीया में बसत ,सूरत मन रिझावे दैय्या॥

3 comments:

  1. चपल रहे...झाड़े रहो...

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  3. अफलातून जी आपका स्वर है ना ? भक्ति से गाया है पूरा गीत है ये ? सुँदर शब्द हैँ -
    किसका लिखा हुआ है ?
    - लावण्या

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पसन्द - नापसन्द का इज़हार करें , बल मिलेगा ।