Tuesday 15 July 2008

जलते हैं जिसके लिए तेरी आंखों के दीए

मेरे जनम के साल में बनी फिल्म सुजाता का यह गीत मेरे पिताजी(अभी उमर ८४) को भी पसन्द है। तरुण शान्ति सेना के शिबिरों में अच्छे गले वाले शिबिरार्थियों से वे इस गीत को सुनने की फ़रमाइश जरूर करते । मैं दरजा सात - आठ में पहुँचा तो गीत की रूमानियत को जज़्ब करने लगा । आज कल विविध भारती वाले इसे कम सुना रहे हैं । बोल इस प्रकार हैं :
जलते हैं जिसके लिए , तेरी आंखों के दीए,
ढूंढ़ लाया हूं वही गीत मैं तेरे लिए ।

दिल में रख लेना इसे हाथों से ये छूटे न कहीं ,
गीत नाज़ुक हैं मेरे शीशे से भी टूटे न कहीं ,
गुनगुनाऊँगा वही गीत मैं तेरे लिए ॥

जब तलक न ये तेरे रस के भरे होटों से मिलें,
यूँ ही आवारा फिरें , गायें तेरी ज़ुल्फ़ों के तले ,
गाए जाऊँगा वही गीत मैं तेरे लिए ॥

Jalte Hain Jiske L...

7 comments:

  1. यह गीत मुझे भी बहुत पसंद है . सच तो यह है कि यह किसे पसंद न होगा . पहली पंक्ति ही ऐसी उठान लिए है कि क्या कहना . ऊपर से तलत महमूद की लरजती आवाज़ .

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  2. वाह, क्या मधुर गीत सुनवाया है ! बचपन का सुना गीत आज भी कानों में वह मिश्री घोल रहा है।
    घुघूती बासूती

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  3. नायाब गीत है--फ़िल्म तो जितनी बार देखी जाये कम है-- आभार

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  4. bahut bahut khoobsoorat geet...thanks

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  5. यह गीत मुझे भी बहुत पसन्दर है। इसको सुनवाने के लिए आभार।

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  6. ये गीत,
    विश्वास से जलते दीपक सा
    मध्धम और मधुर है ~~~

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  7. एकदम नायाब गीत है.
    एक जमाने में मैं इसे गिटार पर बजाया करता था.

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पसन्द - नापसन्द का इज़हार करें , बल मिलेगा ।