Sunday 4 December 2011

देव आनन्द : दिल अभी भरा नहीं

फेसबुक-युग में देव आनन्द का न रहना । कुछ मित्रों ने उन्हें उन्हींकी फिल्मों के गीतों को याद कर श्रद्धांजलि दी है। 'तेरी दुनिया में जीने से,बेहतर है कि मर जाएं'से शुरु कर ,'बादल,बिजली,चंदन,पानी जैसा अपना प्यार,लेना होगा जनम हमें कई-कई बार' से होते हुए 'बहुत दूर मुझे चले जाना है' तक।
बड़ी बहन की लेडीज साइकिल और घर से इजाजत लेकर जिन फिल्मों को अकेले देखा था उनमें प्रमुख थी 'हम दोनों'। फिल्म देखने के बाद के दिनों में एक पुराना ओवरकोट और दो हॉकी-स्टिक लेकर जब एक पांव से चलता था तब बा नाराज हो जाती थी ।
'७४ का आन्दोलन शुरु हुआ तब चर्चा सुनी कि '४२ के दिनों में देव आनन्द 'ऑगस्ट-क्रांति के नायक' जयप्रकाश से मिले थे। आपातकाल में सभी मौलिक अधिकारों के निलम्बित रहने के बाद जब आम चुनाव हुए तब देव आनन्द वरिष्टतम अभिनेता थे जिन्होंने खुलकर कांग्रेस को हराने की अपील की।
फिर बड़े भाई नचिकेता द्वारा बाथरूम के अन्दर (ईको-एफेक्ट के लिए) माउथ ऑर्गन पर 'दूरियां नजदीकियां बन गईं' बजाना, उनके मित्र सुधीर चक्रवर्ती का दो प्लास्टिक की बाल्टियां उलट कर 'बोंगो' का विकल्प बनाना-यह दौर आया। सुधीरदा तो फौज के अधिकारी बन कर चले गये। १९७७ में कोलकाता इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट के यू-ब्लॉक के साथी और सीनियर चन्द्रशेखर शेवडे को जबरदस्त बोंगों बजाते सुना।
देव आनन्द की स्मृति में एक आशु-प्लेलिस्ट प्रस्तुत है :

3 comments:

lata raman said...

क्लासिक! शुक्रिया!

indu puri said...

कोना कटा हुआ था चिट्ठी का .ऐसी चिट्ठियों का इंतज़ार कोई नही करता फिर भी आती है.
इस बार आई एक खूबसूरत शख्स के चले जाने का समाचार ले कर .मेरा भी एक लौटती डाक से जवाब भेज दो बाबु! .कि ............. देव ! तुम हमारे दिल में रहते हो और हमेशा रहोगे .तुम भी एक दिन चले जाओगे यह तो सोचा भी नही था मैंने.बहुत बदसूरत मानती थी मैं खुद को बचपन से.गाइड देखी.भीतर के नूर को बाहर तक कैसे फैलाया जाता है उसी से सीखा और..... अपने प्रेम ,सम्मान की चादर ओढ़ना सीख गई सबको. सामने वाला जीवन भर 'राजू' बनकर रह गया मेरे सामने.
अपने 'ओरा' को बढ़ाना तुमसे सीखा है मैंने राजू!अपने बच्चों को भी सिखाया.स्टाफ को भी फिर.तुम हमसे दूर कैसे जा सकते हो.जो गया वो तो देह मात्र था. देव अपनी फिल्मों में उसी तरह मुस्कराएगा .सबको कहेगा 'प्यार का राग सुनो

दिलीप कवठेकर said...

अरे ओ आसमां वाले बता इसमें बुरा क्या है?

खुशी के चार झोंके इधर से गुज़र जायें...

क्यूं ?