Sunday, 25 April, 2010

आसमां पे है खुदा और ज़मीं पे हम/फिर सुबह होगी/मुकेश/साहिर खय्याम

आसमां पे है खुदा और ज़मीं पे हम
आजकल वो इस तरफ़ देखता है कम
आजकल किसीको वो टोकता नहीं
चाहे कुछ भी कीजिए रोकता नहीं
हो रही है लूटमार फट रहे हैं बम

किसको भेजे वो यहां खाक छानने
इस तमाम भीड़ का हाल जानने
किसको भेजे वो यहां हाथ थामने
इस तमाम भीड़ का हाल जानने
आदमी हैं अनगिनत देवता हैं कम

जो भी है वो ठीक है जिक्र क्यूं करें
हम ही सब जहान की फ़िक्र क्यूं करें
जब उसे ही ग़म नहीं तो क्यूं हमें हो ग़म

गीत - साहिर लुधियानवी
फिल्म - फिर सुबह होगी (१९५८)
स्वर - मुकेश
संगीत- खैय्याम (शर्माजी )

Saturday, 24 April, 2010

नया मधुर गीत/दिल क्यूं ये मेरा शोर करे / केके/काईट्स/ नसीर फ़रज़/राजेश रोशन/

K.K - Dil Kyun Yeh Mera - DesiHit.Net .mp3
Found at bee mp3 search engine


दिल क्यूँ ये मेरा शोर करे
इधर नहीं उधर नहीं
तेरी ओर चले


जरा देर में
ये क्या हो गया
नज़र मिलते ही
कहाँ खो गया


भीड़ में लोगों की वो है वहाँ
और प्यार के मेले में अकेला कितना हूं मैं यहाँ

शुरु हो गई कहानी मेरी
मेरे दिल ने बात ना मानी मेरी
हद से भी आगे ये गुजर ही गया
खुद भी परेशां हुआ
और मुझको भी ये कर गया
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स्वर - केके
फिल्म - काईट्स
गीतकार नसीर फ़राज़
संगीत - राकेश रौशन

Friday, 16 April, 2010

सुन तो सही जहाँ में है तेरा फ़साना क्या/ बेग़म अख़्तर/ख़्वाजा हैदर अली ’आतिश’

सुन तो सही जहाँ में है तेरा फ़साना क्या
केहती है तुझको खल्क़-ए-खुदा ग़ाएबाना क्या



ज़ीना सबा का ढूँढती है अपनी मुश्त-ए-ख़ाक
बाम-ए-बलन्द यार का है आस्ताना क्या



ज़ेरे ज़मीं से आता है गुल हर सू ज़र-ए-बकफ़
क़ारूँ ने रास्ते में लुटाया खज़ाना क्या



चारों तरफ़ से सूरत-ए-जानाँ हो जलवागर
दिल साफ़ हो तेरा तो है आईना खाना क्या



तिब्ल-ओ-अलम न पास है अपने न मुल्क-ओ-माल
हम से खिलाफ़ हो के करेगा ज़माना क्या



आती है किस तरह मेरी क़ब्ज़-ए-रूह को
देखूँ तो मौत ढूँढ रही है बहाना क्या



तिरछी निगह से ताइर-ए-दिल हो चुका शिकार
जब तीर कज पड़ेगा उड़ेगा निशाना क्या?



बेताब है कमाल हमारा दिल-ए-अज़ीम
महमाँ साराय-ए-जिस्म का होगा रवना क्या



यूँ मुद्दई हसद से न दे दाद तू न दे
आतिश ग़ज़ल ये तूने कही आशिक़ाना क्या?
-ख़्वाजा हैदर अली ’आतिश ’

Monday, 5 April, 2010

तू जी ऐ दिल जमाने के लिए/मन्ना डे/बादल/


खुदगर्ज़ दुनिया में ये,इंसान की पहचान है
जो पराई आग में जल जाये,वो इंसान है

अपने लिए जीए तो क्या जीए - २
तू जी ऐ दिल जमाने के लिए
अपने लिए

बाज़ार से जमाने के,
कुछ भी न हम खरींदेगे-२
हाँ, बेचकर खुशी अपनी औरों के गम खरीदेंगे
बुझते दिए जलाने के लिए-२
तू जी ऐ दिल,ज़माने के लिए
अपने लिए..

अपनी ख़ुदी को जो समझा,उसने ख़ुदा को पहचाना
आज़ाद फ़ितरतें इंसां, अंदाज़ क्या भला माना
सर ये नहीं झुकाने के लिए -२
तू जी ऐ दिल,ज़माने के लिए
अपने लिए..

हिम्मत बुलन्द है अपनी , पत्थर सी जान रखते हैं
कदमों तले ज़मीं तो क्या,
हम आसमान रख़ते हैं .
गिरते हुओं को उठाने के लिए
तू जी ऐ दिल,ज़माने के लिए
अपने लिए....

चल आफ़ताब लेकर चल,चल माहताब लेकर चल-२
तू अपनी एक ठोकर में सौ इंकलाब लेकर चल
जुल्म-ओ-सितम मिटाने के लिए
तू जी ऐ दिल जमाने के लिए
अपने लिए....

- जावेद अख़्तर नहीं जावेद अनवर
संगीतकार उषा खन्ना