Sunday, 23 August, 2009

गाइये गणपति जगवन्दन / तुलसीदास /आश्विनी भिडे देशपाण्डे

गाइए गणपति जग वन्दन ,
शंकर सुवन , भवानीनन्दन ।
सिद्धि सदन,गजवदन ,विनायक ,
कृपा-सिन्धु , सुन्दर सब लायक ।
मोदक प्रिय,मुद मंगलअदाता ,
विद्या-वारिधी ,बुद्धि विधाता ।
मांगत तुलसीदास कर जोरे,
बसे राम-सिय मानस मोरे ॥

शास्त्रीय गायन की वरिष्ट कलाकार अश्विनी भिडे देशपाण्डे के स्वर में , राग विहाग में यह प्रस्तुति ।




[कृपया पूरी बफ़रिंग के बाद सुनें - बिना बाधा। सबसे पहले बड़े तिकोने पर खटका मारें । बफ़रिंग के लिए ,कर्सर को प्लेयर के निचले हिस्से में स्थित नियंत्रण पर ले जाकर , शुरु होते ही रोक दीजिए तथा खड़ी डण्डियां भर जाने तक प्रतीक्षा करें(या अन्य काम करें),तब सुनें । ]

Saturday, 22 August, 2009

मैं दादा बन गया !


परसों भीमसेन जोशी का गीत लगाते वक्त बमबम उर्फ़ सुकरात और पूजा की याद तो खूब आ रही थी लेकिन मुझे अन्दाज था कि नवागन्तुक के आने की अपेक्षित तिथि में विलम्ब है । बालक भीमसेन जोशी के गीत और आने वाली पीढ़ी की तरह फ़ास्ट निकला, आज पैदा हो गया ।
४ अगस्त , १९७५ के दिन बनारस के सरकारी जिला महिला अस्पताल में बमबम की पैदाईश की याद घूम गयी । आपात काल लगे मात्र १०-११ दिन हुए थे । बमबम के पिता , मेरे बड़े भाई नचिकेता भूमिगत थे । मेरी माँ को चिन्ता थी कि कि भाई ऐन वक्त पर पहुँचेगा भी या नहीं । लगता था कि बमबम ने मेरी भाभी रत्ना को खूब झेलाया होगा । मेरी दीदी उसी अस्पताल में चिकित्साधिकारी थी ।
बमबम बनारस में चार साल की उमर तक था । लंगोट बदलने आदि की मुझे पहली तालीम देते हुए।
बमबम और ’बेटा रामदास’ मेरे दिए हुए नाम हैं । आज फोन पर उससे पूछा, ’टनटन ?’ तो उसे लगा कि ककवा फिर नाम रखने लगा ।
अपने गुरुजी श्री छन्नूलाल मिश्र का गाया यह सोहर प्रस्तुत करने का आज उपयुक्त दिन । हमें जो सोहर उन्होंने सिखाया था , उससे बेहतर है ,यह:
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Thursday, 20 August, 2009

ठुमक ठुमक पग ,कुमक कुंज मद,चपल चरण हरि आए/भीमसेन जोशी/जयदेव/अनिल चटर्जी/अनकही

अनकही (१९८५) फिल्म में लिया गया भीमसेन जोशी का गाया तुलसी का भजन "रघुवर तुमको मेरी लाज” इस चिट्ठे पर प्रकाशित किया था । वह भजन भी फिल्म में प्रसिद्ध बाँग्ला अभिनेता अनिल चटर्जी ( २५ अक्टूबर १९२९ - १७ मार्च १९९६ )गा रहे हैं । मेरे प्रिय मित्र - श्रोता विष्णु बैरागी ने तब कहा था , ’ पापाजी (जयदेवजी)ही ऐसे अनूठे और साहसी प्रयोग कर सकते थे। वे गीतों की धुनें नहीं रचते थे, आत्‍मा को शरीर प्रदान करते थे।’ फिल्म में इस पूरे गीत का फिल्मांकन - विष्णु भाई के कथन को पूरी तरह चरितार्थ करता हुआ ! दीप्ति नवल का प्रसव, श्रीराम लागू की पायचारी , दीना पाठक की चिन्ता , अनिल चटर्जी की निश्चन्तता , अमोल पालेकर की गति !
मानोषी ने तब बताया था कि "फिल्म का हर गाना उम्दा है " । ढ़ूँढ़ लिए थे गीत लेकिन सुनाने का जुगाड़ अब हो पाया।
कोई गीतकार का नाम बता दे !



[ प्लेयर पर कर्सर को निचले भाग में ले जायेंगे तो नियन्त्रण के औजार दिखाई देंगे। फिर से सुनने के लिए गीत समाप्त होने पर कर्सर निचले भाग में ले जाना होता है और खटका मारना होता है । फिर से सुनने , एम्बेड कोड और डाउनलोड के प्रावधान परदे पर प्रकट हो जाते हैं । डिवशेयर की खूबी है कि दूसरी बार (बफ़रिंग के पश्चात) सुनने पर बिलकुल रुकावट नहीं होती । ]

Thursday, 6 August, 2009

माउथ ऑर्गन के उस्ताद मदन कुमार अहमदाबाद में

वडोदरा और अहमदाबाद में गैर पेशेवर स्तर पर माउथ ऑर्गन बजाने वालों के क्लब हैं । माउथ ऑर्गन को हार्मोनिका भी कहा जाता है । मेरे बड़े भाई नचिकेता ’हार्मोनिका क्लब ऑफ़ गुजरात’ के सक्रिय सदस्यों में एक हैं ।
करीब आठ साल की उम्र से वह माउथ ऑर्गन का दीवाना हुआ था - यानी मेरी पैदाइश के आसपास कभी । मेरी माँ की नानी स्नेहलता सेन शान्तिनिकेतन की स्थापना के समय से वहाँ के एक छात्रावास की अधीक्षक थीं और मेरी नानी और उनके दो भाई शान्तिनिकेतन के शुरुआती विद्यार्थियों में थे । नानी वीणा बजातीं और मेरी माँ के छोटे मामू जान (हमारे दादुल) बाँसुरी । माँ के ममेरे भाइयों में एक माउथ ऑर्गन बजाते थे और उन्हें देख कर ही भाई साहब पर इसकी धुन सवार हो गयी थी ।
पिछले रविवार को अहमदाबाद के हार्मोनिका क्लब के सदस्यों का उत्साह देखने लायक रहा होगा । भारत में माउथ ऑर्गन बजाने वालों में श्रेष्ठतम मदन कुमार अहमदाबाद आये हुए थे और क्लब वालों के बीच आना स्वीकार किया था । मदन कुमार ने इनके बीच अपनी राम कहानी सुनाई ,धुनें सुनाईं और कुछ सबक भी दिए । उन्हें शैशव से ही पिता का स्नेह नहीं मिला और अपने संघर्ष के बूते वे देश के सर्वश्रेष्ठ माउथ ऑर्गन वादक बने । आज कल पुणे में वे बच्चों को बजाना सिखाते हैं ।
उनकी अपनी जुबानी उनकी राम कहानी हार्मोनिका क्लब ऑफ़ गुजरात के ब्लॉग पर आती रहेगी । यहाँ क्लब के विशेष सौजन्य से उनका बजाया ,उनके सर्वाधिक पसन्दीदा गीत - ’याद किया दिल ने कहाँ हो तुम ’ की धुन ।



सुबह सिलोन पर मदन कुमार को सुनने के अलावा शाम को विविध भारती पर ’साज और आवाज’ की भी आपको याद होगी । इसलिए उन दिनों की याद में मूल गीत भी सुनिए :



[ प्लेयर पर कर्सर को निचले भाग में ले जायेंगे तो नियन्त्रण के औजार दिखाई देंगे। फिर से सुनने के लिए गीत समाप्त होने पर कर्सर निचले भाग में ले जाना होता है और खटका मारना होता है । फिर से सुनने , एम्बेड कोड और डाउनलोड के प्रावधान परदे पर प्रकट हो जाते हैं । डिवशेयर की खूबी है कि दूसरी बार सुनने पर बिलकुल रुकावट नहीं होती । ]

Wednesday, 5 August, 2009

अज़दक के लिए : मुझे प्यार तुमसे नहीं है / घरौंदा/ रूना लैला/जयदेव/गुलजार

पिछले साल जब रूना लैला के गीत यहाँ लगाये थे , अज़दक ने सराहा था । सभी रसों को ग्रहण करने वाला - इसके लिए हमारे हिन्दी के गुरुजी ने एक नाम बताया था - आश्रय । तो अपने इस आशिक-मिजाज आश्रय मित्र के लिए यह गीत-



तुम्हे हो न हो मुझको तो इतना यक़ीं है
मुझे प्यार तुमसे नहीं है , नहीं है ।
मुझे प्यार तुमसे नहीं है ,नहीं है
मगर मैंने ये राज़ अब तक न जाना
के क्यों प्यारी लगती हैं बातें तुम्हारी,
मैं क्यों तुमसे मिलने का ढूँढू बहाना
कभी मैंने चाहा तुम्हें छू के देखूँ,
कभी मैंने चाहा तुम्हें पास लाना
मगर फ़िर भी इस बात का तो यकीं है...

फ़िर भी जो तुम दूर रहते हो मुझसे,
तो रहते हैं दिल पे उदासी के साये ।
कोई ख़्वाब ऊँचे मकानों से झाँके ,
कोई ख़्वाब बैठा रहे सर झुकाये
कभी दिल की राहों में फैले अँधेरा
कभी दूर तक रोशनी मुसकुराये ।
मग़र फ़िर भी इस बात का तो यक़ीं है......

- गुलज़ार नहीं नक्श लायलपुरी (विनयजी के सुधारने पर)





[ प्लेयर पर कर्सर को निचले भाग में ले जायेंगे तो नियन्त्रण के औजार दिखाई देंगे। फिर से सुनने के लिए गीत समाप्त होने पर कर्सर निचले भाग में ले जाना होता है और खटका मारना होता है । फिर से सुनने , एम्बेड कोड और डाउनलोड के प्रावधान परदे पर प्रकट हो जाते हैं । डिवशेयर की खूबी है कि दूसरी बार सुनने पर बिलकुल रुकावट नहीं होती । ]